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काम आया है

सुबह का भुला साम आया है।
हो करके बदनाम आया है।

सियासत का रोग लगा था,
वो करके सारे काम आया है।

बगल में छुरी छिपा रखता है,
मुह पर अल्ला, राम आया है।

किस किस को लगाया चुना,
बना के झंडुबाम आया है।

खादी तन पर पहन के घुमा,
होकर नँगा  हमाम आया है।

वादे बड़े बड़े करता था,
कभी न किसी के काम आया है।

अब के किसको चढ़ाएं सूली
सबसे पहले मेरा नाम आया है।

प्रसाद' रोटी लिए जेब में रख,
क़बर में जा कर काम आया है।

मथुरा प्रसाद वर्मा 'प्रसाद'

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मोर छत्तीसगढ़ी गीत: छत्तीसगढिया शायरी

 छत्तीसगढिया शायरी

1. बहुत अभिमान मैं करथौ
छत्तीसगढ के माटी मा ।
मोर अंतस जुड़ा जाथे
बटकी भर के बसी मा।
ये माटी नो हाय महतारी ये
एकर मानतुम करव
बइला आन के चरत हे
काबरतुम्हर बारी म ।।
2
मय तोर नाव लेहुँ
अउ तोरे गीतगा के मरजाहूं ।।
जे तै इनकार कर देबे
तमय कुछु खा के मर जाहुं ।।
अब तो लगथे ये जी जाही
संगी रे तोरेमया म
अउ कह इकरार कर लेबे
त मय पगला के मर जाहुं ।।
3 मय कइसे पथरा दिल ले काबर पियार कर डारेव ।।
जे दिल ल टोर के कईथे का अतिया चार कर डारेव ।।
नई जानिस वो बैरी हा कभू हिरदे के पीरा ल
जेकर मया मय जिनगी ल

सखी

लिखूं तुम्हारे लिए सखी मैं, इस जीवन का अंतिम गान।
तुच्छ कवि की महाकल्पना
कर सके जिसपर अभिमान।मन ये चाहे टिस प्रेम की
आज तुम्हारे हृदय में भर दूँ।
और अधरों के कंपन को
शब्दों से सम्मोहित क्र दूँ।
मधुर नहीं है मेरे स्वर पर,
मैं छेडू कुछ ऐसी। तान।भावनाएं हो जाए पंछी ,
हृदय मेरा गगन हो जाए
हसी तुम्हारी  खिली रहे
जीवन मेरा मधुबन हो जाये
और चाहिए मुझे सखी क्या
इससे बड़ा कोई सम्मान।

मसिहा

जब जब लोगो पर हुए अत्याचार
लोगो ने लगाई गुहार

सर पर कफन बांधे आया मसिहा
और लडता रहा लोगो के लिए
दिन रात ।

सहता रहा आघात पत्थरों के
चुना जाता रहा दिवारों पर

चढता रहा सुलियों पर
छलनी होता रहा गोलियों से
बार बार ।

लोग बने रहे तमाशाबिन
बैठे रहे चुपचाप

 छटपटाते हुए देखते रहे
 मसिहा को
जुल्म बढता रहा
हर रोज।

और जब
 मर गया मसिहा
लोग करने लगे इंतिजार
फिर एक बार

और किसी मसिहे की
 मसिहाआएगा
 ओर हमें बचाएगा
बार- बार,
बार- बार,
बार- बार