अब मुझ को भी डर लगता है, नइ लगना था पर लगता है। जब जब सोचा सच मैं बोलूं, सर पर आ पत्थर लगता है। बहुत हौसला मुझमें है पर, उड़ने को दो पर लगता है। जब जब भाई घर आता है, आँगन में बिस्तर लगता है। छोटे घर दरवाज़ा छोटा, पाँव उठाऊँ सर लगता है। जिस दिन माँ की याद न आए, सूना सारा घर लगता है। भाई मुझ से दूर बहुत है और मुझे फ़िकर लगता है। मेहनत करके खाना बेटा, ये दुनियाँ सुन्दर लगता है। झूठ बोल कर लूटेगा जो, मीठा उसका स्वर लगता है। दर्द छुपाकर हँस लेने में, यारों बहुत हुनर लगता है। बात ज़रा-सी होती है पर, दिल पर जैसे ज़हर लगता है। मथुरा "प्रसाद" वर्मा की बातें बोल न किसको खर लगता है।
न जाने कब मौत की पैगाम आ जाये जिन्दगी की आखरी साम आ जाए हमें तलाश है ऐसे मौके की ऐ दोस्त , मेरी जिन्दगी किसी के काम आ जाये.