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क्या-क्या करें ?

क्या-क्या करें  ? क्या-क्या न करें  ? हमने उनपे सब छोड़ा है,   जो करना  है खुदा करें। बचपन की उखड़ती साँसे हैं। ममता की बेबस आँखें है। वो फिर भी महल बनायेंगे, कोई मरता है,तो मरा करें। यहाँ खून से आंटा सनती है। तब जाकर रोटी बनती  है। हर दाने पर पहरे बैठें हैं, जिन्हें भूख लगे वो दुवा करें। जब जुल्म की आँधी चलती है। इंसाफ कुचल दी जाती  है। यहाँ न्याय गवाही मांगेगी, अन्याय भले ही हुआ करें। यहाँ  सच्चा हमेशा हरता है। और झूठा  बाजी  मरता है। 'प्रसाद" मगर सच बोलेगा, कोई सुने या अनसुना  करे ।

खतरा है !

नई पीढ़ी के हाथों में , बन्दुक थमा दो खतरा है । बच्चों को भी हिंसा का पाठ पढ़ा दो  खतरा है । रोटी न हो, शिक्षा न हो, पर हथियार जरुरी है; खेतों और खलिहानों में बारूद उगा दो खतरा है । कौन आसामी,कौन बिहारी और हिन्दू,मुसलिम कौन ? घर-घर में नफरत की दिवार उठा दो खतरा है ।। हर पेट मांगेगी रोटी, हर हाथ मांगेगा काम; बेहिसाब बढ़ी आबादी, गोली चलवा दो खतरा है। महलों में रहने वाले वो  चोर हमसे कहते है, घर में कहीं न आग लगा दे, दिया बुझा दो खतरा है ।।           मथुरा प्रसाद वर्मा "प्रसाद"