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मेरी कविता

ऐ मेरी कविता ! ऐ मेरी कविता  ! मैं सोचता हूँ लिख डालूं , तुम पर भी एक कविता !  रच डालूं  अपने बिखरे कल्पनाओं  को   रंग डालूं  स्वप्निल इन्द्र धनुषी रंगों से, तेरी चुनरी ! बिठाऊँ शब्दों की डोली में और उतर लाऊँ   इस धरा पर ! किन्तु मन डरता है ! ह्रदय सिहर जाता है  तुम्हे अपने घर लाते हुए ! कि कहीं तुम भी  टूट न जाओ, उन सपनों की तरह  जो  बिखर गए टूट कर !  

मुक्तक

ज़माना छोड़ दे तन्हा, नजर सायें नहीं  आये, दुवा  करना कभी लेकिन कि अपना साथ न छूटे । भले मझधार हो कश्ती कहर तूफान बरपाए , मगर तुम हौसला रखना हमारा  हाथ ना  छूटे। सदा तुम  मुस्कुराना पर  तुम्हारे मुस्कुराने से, रहे बस ख्याल इतना सा,  किसी का दिल नहीं टूटे । ये महफ़िल है तो महफ़िल में  शिकायत भी बहुत होगी, किसी के रूठ जाने से  मगर ये महफ़िल नहीं टूटे।

मुक्तक : चलना सीख जाओगे

सुना करते हो क्यों इनकी,  ये कुछ क्या खास करते है। जो कुछ भी कर नहीं सकते,  वही बकवास करते है। लगाते है ये औरों पर  बड़े लाँछन लगाने दो, बुरा खाने से अच्छा है  चलो उपवास करते है। अगर खाने पे मन अटके  कभी उपवास मत करना। कभी छल कर किसी का मन, कहीं भी रास मत करना। तपोवन घर लगेगा जब  सरल मन ये तुम्हारा हो, हो मैला जब भी ये दर्पण,  किसी के पास मत करना। अगर घाटे का सौदा हो,  कभी व्यापार मत करना। नफा नुकसान जब सोचो, तो फिर तुम प्यार मत करना। जहाँ बेमोल बिक जाने से  तुझको भी लगे अच्छा,  ये सौदा कर तो सकते हो  मगर हर बार मत करना। गधे के सींग जैसे हैं  न जाने कब दिखाई दे। गले मिलने चले आते है, जब मतलब दिखाई दे। खुदा महफूज रक्खे तुमको  इन मक्कार यारों से, मेरे बेटे सम्हल कर चल  ये काँटे जब दिखाई दे। सहीं कहते थे बाबूजी,  खुसी औ गम नहीं होंगे। हमेशा एक जैसा कोई भी  मौसम नहीं होंगे। तुझे गिरना सम्हल जाना,  खुदी से सीखना होगा। ये उँगली थामने तेरा  हमेसा हम नहीं होंगे। निकल कर देख लो घर से सम्हलना सीख ...

ढाई इंच मुस्कान

सुरज बनना मुश्किल है पर , दीपक बन कर जल सकते हो। प्रकाश पर अधिकार न हो, कुछ देर तो तम को हर सकते हो । तोड़ निराश की बेड़ियाँ, आशाओं से मंजिल गढ़ लो। बटोही चाहे शूल हो पथ में, चाहे आग्नि पथ हो बढ़ लो।  नहीं है सम्भव मानव हो कर, नीलकंठ होना विष पी कर। सम्भव पर इतना है साथी, परहित देखें पल भर जी कर।  त्याग को आदर्श बनाकर,  सार्थकता न हो जीवन की।  ढाई इंच मुस्कान बाँट कर,  हर सकते हो पीड़ा मन की  हाहाकार किस लिए मचा है, कौन रहा है किसे पुकार । क्या रक्खा है इन बातों में, चला जा मांझी तू उस पार।

लेस दे जे घर अपन वो मोर सँग मा आय।

देख के रद्दा म काँटा मँय मढाथव  पाँव। अउ दही के भोरहा कपसा घलो ला खाँव। झन कहूँ बिजहा मया के बोंय के पछताय। लेस दे जे  घर अपन वो मोर सँग मा आय। फूल पर के भाग काँटा मोर हे तकदीर । मोर मन ला भाय सिरतों ये मया के पीर। रोय भीतर फेर बाहिर हाँस के मुस्काय। लेस दे जे  घर अपन वो मोर सँग मा आय। घाम सह के प्यास रह के जे नही अइलाय। जे भरोसा राम के तुलसी सहीं हरियाय। मोर बिरवा हा मया के रातदिन ममहाय।  लेस दे जे  घर अपन वो मोर सँग मा आय।

लेस दे जे घर अपन वो मोर सँग मा आय।

देख के रद्दा म काँटा मँय मढाथव  पाँव। अउ दही के भोरहा कपसा घलो ला खाँव। झन कहूँ बिजहा मया के बोंय के पछताय। लेस दे जे  घर अपन वो मोर सँग मा आय। फूल पर के भाग काँटा मोर हे तकदीर । मोर मन ला भाय सिरतों ये मया के पीर। रोय भीतर फेर बाहिर हाँस के मुस्काय। लेस दे जे  घर अपन वो मोर सँग मा आय घाम सह के प्यास रह के जे नही अइलाय। जे भरोसा राम के तुलसी सहीं हरियाय। मोर बिरवा हा मया के रातदिन ममहाय।  लेस दे जे  घर अपन वो मोर सँग मा आय।

एक सच

सुन कर आश्चर्य होगा मुझे ज्यादातर कविताएं तब सूझती है जब मैं टॉयलेट सीट पर बैठा होता हूँ। और वहाँ से उठकर , कागजपर लिखकर मैं  हल्का बहुत हल्का होता हूँ।

पलके बिछाएं हूँ अब तक !

उनके चाहत के सपने सजाएँ हूँ अब तक ! उनके यादों को सिने में बसाये हूँ अब तक !  वो मासूम चेहरा, वो झील सी गहरी आँखें ; वो उनका मुस्काना ,वो उनका शर्माना, भोली सूरत को आँखों में छुपाये हूँ अब तक ! छुप-छुप के हम फिर  हथेली से अपना सहारा छुपाना ; कुछ भी तो नहीं भुला पाए हूँ अब तक ! वो जागी जागी, रातें वो तेरी बातें ; वो जुदाई के दिन , और वो मुलाकातें ; उन्ही यादों में कहाँ  ,  सो पाए हूँ अब तक ! प्यासी-प्यासी सी मेरी भीगी  निगाहें ; ताकती रहती है तेरी वो सुनी राहें ;  तेरी राहों में पलके बिछाएं हूँ अब त क !

उजाले के फरेब

वो रौशनी ओढ़ कर,  अन्धियारे को  छलना चाहता था। वो किरण को अपने चेहरे पर, मलना चाहता था। वो पगला था ,  दिए की तरह जलना चाहता था । सच्चाई के पथ  पर अकेले, चलना चाहता था। उसने सीखा था जीवन से , सिर्फ अन्धियारे से डरना। बहुत मुश्किल होता है बिना तेल और बाती के जलना। वो नहीं जनता था  उजाले के फरेब को। उजाला टटोलती है, आदमी के जेब को। उजाले के चकाचौंध ने हर आदमी को छला है। पतंगा है तो कभी न  कभी जरूर जला है । वो गिरा है अक्चकाकर वहाँ, जहाँ उजाले का घेरा है। और तब से अब तक  उसके आँखों में सिर्फ अँधेरा है। मथुरा प्रसाद वर्मा "प्रसाद"

याद तुम्हारी आती है।

कोई भवरा गाता है जब, जब कोई कली शरमाती है। खिल उठती है कली कोई, गलियाँ महक जब जाती है। तो सच प्रिये! याद तुम्हारी आती है। चलती है बसन्ती मन्द पवन, झूम उठता है तन मन। चिड़ियों की सुन युगल तान जब साम ढल जाती है। तो सच प्रिये! याद तुम्हारी आती है। मतवाला हो जाता ये गगन। झूम कर बरसता जब सावन। घुमड़-घुमड़ कर काली घटा, जब  धरती पर छा जाती है। तो सच  प्रिये ! याद तुम्हारी आती है। ऊँचे-ऊँचे परवत शिखर पर , नित बहते है जहां निर्झर। दूर क्षितिज के छोर पर जहां नभ् भी झुक जाती है। तो सच प्रिये! याद तुम्हारी आती है। कभी तारों की  बारातों में। जब देखूं चाँदनी रातों में। करती चाँद अठखेली जब बादल में छिप जाती है। तो सच प्रिये! याद तुम्हारी आती है।। दूर कहीं जब गाँवों में। बजती है पायल पावों में। आकर सजन की बाँहों में नववधू कोई शरमाती है।। तो सच प्रिये! याद तुम्हारी आती है।।

अरे सावन ! तुम क्यों आते हो।

बादल बन कर छा जाते हो। रिमझिम बरखा बरसाते हो। प्रिय मिलन की आश जगा कर बिरहन को तरसाते हो।              अरे सावन! तुम क्यों आते हो। ला कर  शीतल पुरवाई तुम, डाल डाल  महकते हो। विरहा मन मेें आग लगाकर तुम क्यों मुझे रुलाते हो।           अरे! सावन तुम क्यों आते हो। प्रेम सुधा तुम बरसा कर वसुधा की प्यास मिटाते हो। और इधर तुम प्रेम बावरी के, मन की प्यास बढ़ाते हो।            अरे सावन! तुम क्यों आते हो।

मजबूर कवि

मैं अदना सा कवि, लिखने के सिवाय कुछ कर नहीं सकता। चीख सकता हूँ, चिल्ला सकता हूँ, मगर लड़ नहीं सकता। मरने के लिए हर रोज जी लेता हूँ मगर जिन्दा रहने के लिए एक बार मर नहीं सकता। कैप्शन जोड़ें

तेरे कदम भी बहके क्यों?

फूल हूँ ये गुमान था तो, मेरी गली में महके क्यों ? मैं हुआ मदहोश था पर, तेरे कदम भी बहके क्यों? अगर घटाएं घिर आये तो, एक बून्द की आस न हो? छलकते गागर को देखूं , क्यों थोड़ी भी प्यास न हो?    प्यास मेरा गुनाह था पर,    गगरी तेरी छलके क्यों? माना अंधियारे में जीने की, मेरी अपनी आदत थी। एक दिया जले इस आँगन में, यह भी तो मेरी चाहत थी।    मुझे चाह थी एक किरण की   तुम शोला बन दहके क्यों? रेगिस्तान मेरा मन था, पतझर ही था मेरा जीवन। मान विधाता की नियति, कभी न चाहा मैंने उपवन।    मेरे आँगन के बाबुल में, कोई विहंग फिर चहके क्यों।।

घोटाले देंगे

सपने बड़े निराले देंगे।। हर रोज नए घोटाले देंगे।। राजनेता हम इस देश को। बीवी ,बच्चे और साले देंगे।। चाबी दे दे कर चोरों को फोकट में सबको ताले देंगे।। घासलेट महंगी हुई तो क्य...

जीवन के सपने

मैंने चाहा था कभी जीवन के बेरंग कैनवास पर हसिन सपनो से रंग देना। मैं उम्रभर भागता रहा उन्ही सपनो के पीछे। तलाशता रहा दुनियाँ भर के रंग ताकि जीवन हो सके रंगीन सपनों की तरह। ...

जीवन

जीवन जीवन क्या सिर्फ इसलिए है कि चाहे जैसे भी हो जिया जाये । इस हलाहल को पीना ही है तो क्यों न मुस्कुरा कर पिया जाये। कोई लक्षय नही पथ ही पथ है और उनपर चलना सिर्फ चलना है। सुवि...

प्यास

वो चींखने चिल्लाने वाले कौन है ? कौन है? कौन है ? जो भूखे है ? जो प्यासे है ? बेघर है? नंगे है ? क्या उनके दंगे है ? अरे नहीं ! उन्हें भला कहा फुर्सत है ? वो क्यों  चीखेंगे ? क्यों चिल्लायेंगे? वो सब तो मौन है। फिर भला ये कौन है? ये वो है जो ख़ास मौको पर आते है हमारी भूख और प्यास रोटी और गरीबी को जो लोग भुनाते है। ये वही लोग है जो चिल्लाते है जो हमारी प्यास से अपनी प्यास बुझाते है।

रोटी और भूख

रोटियां तब भी बिकती थी। रोटियां अब भी बिकती है। रोटियां वो भी बेचते थे रोटियां ये भी बेचते है। फर्क है बस इतना कि तब हम रोटियां खरीद नहीं पाते थे।। अब रोटियां खा नहीं पाते। क्यू कि भूख तब भी नहीीं बिकता था भूख अब भी नही बिकता है।

आजकल

बुझाते हुए दिये भी सितारा लगे है आजकल।। मझधार भी जाने क्यू किनारा लगे है आजकल।। फूल हमेशा साथ देते नहीं यह जानकर काँटों का साथ ही प्यारा लगे है आजकल।। तुम कुछ सोचो मैं कुछ स...

जज्बात समझ लूंगा।

जो तुम्हारे दिल में होंगे, मैं वो जज्बात समझ लूंगा ।। जो तुम कह भी नहीं पाते मैं वो बात समझ लूंगा ।। तुम बादल हो चाहो जहाँ   पर बरस लेना ये पलकें भीग जाएँगी , मैं बरसात समझ लूंगा।। जिन्हें भी भूख लगाती है रोटी क्यू नहीं मिलती कोई ये बात समझा है जो मैं ये बात समझ लूंगा ।। अच्छा है मुझे देखकर तुम निगाहें फेर लेती हो कही तुम मुस्कुरा दोगी तो मैं सौगात समझ लूंगा ।। जो रात आये तो मेरी माँ तू मुझको सुला देना; मैं नादां हु रात को दिन, दिन को रात समझ लूंगा।। कहीं कोई भी गिर जाये मैं अक्सर दौड़ पड़ता हू ये ये उंगली कोई भी  पकड़े  मैं तेरा हाथ समझ लूंगा।। जब तक  दिल करे चलना,फ़िर रास्ता बदल लेना नसीब में लिखा था यहीं तक तेरा साथ  समझ लूंगा   ।।