अब मुझ को भी डर लगता है, नइ लगना था पर लगता है। जब जब सोचा सच मैं बोलूं, सर पर आ पत्थर लगता है। बहुत हौसला मुझमें है पर, उड़ने को दो पर लगता है। जब जब भाई घर आता है, आँगन में बिस्तर लगता है। छोटे घर दरवाज़ा छोटा, पाँव उठाऊँ सर लगता है। जिस दिन माँ की याद न आए, सूना सारा घर लगता है। भाई मुझ से दूर बहुत है और मुझे फ़िकर लगता है। मेहनत करके खाना बेटा, ये दुनियाँ सुन्दर लगता है। झूठ बोल कर लूटेगा जो, मीठा उसका स्वर लगता है। दर्द छुपाकर हँस लेने में, यारों बहुत हुनर लगता है। बात ज़रा-सी होती है पर, दिल पर जैसे ज़हर लगता है। मथुरा "प्रसाद" वर्मा की बातें बोल न किसको खर लगता है।
भँवर है लहर है किनारा नहीं है। ये मजघार है पर सहारा नहीं है। चलो आजमाएं खुदी हौसले को, हमीं हम है कोई हमारा नहीं है। जिन्हें जीतना हो, वो खुद से ही लड़ ले, किसी और से कोई हारा नहीं है। जमीन पर जो मां है, वो दोनों जहां क्या, फलक पे भी ऐसा सितारा नहीं है। जहां देखता था, वहां तुम ही तुम थे, नजर है मगर अब नजारा नहीं है। बहुत दिल किया था चलो लौट जायें, मगर कोई हमको पुकारा नहीं है। उठेगा चलेगा भले गिर गया है, अभी हौसला वो भी हारा नहीं है। जहाँ तुम नहीं हो वहाँ भी है खुशियाँ, मगर कोई तुमसा ही प्यारा नहीं है।