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जख्म जितने मिले थे हरा है अभी

212 212 212 212 जख्म जितने मिले थे हरा है अभी। दर्द है कम मगर दिल डरा है अभी। आशुओं को बहा दूँ इजाजत नहीं, ऐ जमाने नहीं दिल भरा है अभी। तुम भी मासूम थे हम भी मासूम हैं, वो भी मासूम था जो मरा है अभी। दिल जला है मेरा इश्क के नाम पर, है ये सोना नहीं पर खरा है अभी। जिनके हाथों ने सदियों पिया है लहू, छूटा तलवार पर उस्तरा है अभी। चाहता था कि मैं जी हुजूरी  लिखूं। उंगलियों ने बगावत करा है अभी।

गजल : मेरे भीतर जो बागी है वो अक्सर सर उठाता है।

कभी वो चीखता है और कभी पत्थर उठाता है। वो लड़ता है जुलुम से जो कहीं क्या घर उठाता है। है मुश्किल पर पिला कर मैं उसे खामोश रखता हूँ, मेरे भीतर जो बागी है वो अक्सर सर उठाता है। शहर आता है चलकर गाँव से जब भी कोई लड़का, सुना है सबसे ज्यादा सर पे अपने डर उठता है। बड़ा चालाक है स्वारथ में जिसके चांटता तलवा, भरोसा जिसने की उस पीठ में खंजर उठाता है। सियासत उन नए चेहरों को अक्सर ढाँक देती है, के हक में जो गरीबों के, ही मुद्दे हर उठाता है। बहुत मजबूर होकर जो, कभी कुछ बोलना चाहा, मुहब्बत है नहीं, पर है, ये वो कहकर उठाता है। तभी महफूज रहता है के रट कर बोलता है जब, शिकारी काटता है जो परिंदा पर उठाता है।

छत्तीसगढ़ी गजल : बेंच दे है सब कलम बाजार मा।

कोन लिखथे साँच अब अखबार मा। बेंच दे हे सब कलम बाजार मा। नाँव के खातिर मरे सनमान बर। रेंगथे कीरा सहीं दरबार मा। साँच बोले के जुलुम होगे हवे। काट मोरो  घेंच ला तलवार मा। हाँ तहूँ जी भर कमा ले लूट ले, तोर मनखे बइठगे सरकार मा। तँय कहूँ ला सोज रद्दा झन बता,  जे भटकथे घर बनाथे खार मा। तँय मसाला डार जे जतका मिले, नून कमती नइ चलय आचार मा।

काम आया है

सुबह का भुला शाम आया है। हो करके बदनाम आया है। सियासत का रोग लगा था, करके सारे काम आया है। आस्तीन में छुरी है पर, मुँह पर अल्ला राम आया है। किस किस को लगाया चुना, बना के झंडुबाम आया है। खादी तन पर पहन के घुमा, होकर नँगा  हमाम आया है। वादे बड़े बड़े करता है, कभी किसी के काम आया है? अब के किसको चढ़ाएं सूली पहले मेरा नाम आया है। प्रसाद' रखता जेब में रोटी, क़बर में जा काम आया है। मथुरा प्रसाद वर्मा 'प्रसाद'