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अमृत ध्वनि छंद : मोर कराही

मोर कराही कस हृदय, सब बर हे अनुराग। माढ़े आगी के ऊपर, दबकावत हँव साग। दबकावत हँव, साग सबे बर, किसम किसम के। हरदी मिरचा, मरी मसाला, डारँव जमके। मन के भितरी,पोठ चुरत हे,  साग मिठाही। कलम ह करछुल, कविता मोरे,मोर कराही।

अमृत धावनि छंद : काँटा

काँटा बोलय गोड़  ला, बन जा मोर मितान । नेता मन ला आज के, जोंक बरोबर जान । जोंक बरोबर, जान मान ये, चुहकय सबला। बन के हितवा, स्वारथ खातिर, लूटय हमला । धरम जात मा, काट काट के, बाँटय  बाँटा । आगुवाए ले, सदा गोड़ ला, रोकय काँटा ।