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मुक्तक छत्तीसगढ़ी

  पहिली जाल बिछाही पाछू, सुग्घर चारा डार दिही। तोरे राग म गाना गाही, मया के मंतर मार दिही। झन परबे लालच मा पंछी,देख शिकारी चाल समझ; फाँदा खेले हावय जे हा,अवसर पा के मार दिही। चारा के लालच देखाही, फांदा खेल फँदाही रे। झन बन जांगर चोट्टा बैरी,इक दिन जान ह जाही रे। रोज कमा के खाथन सँगी,स्वाभिमान से जीथन जी, माथ नवा जे तरुवा चाँटय,जूट्ठा पतरी पाही रे। चारा के लालच देखाही, फांदा खेल फँदाही रे। देख चिरइ तँय लालच झन कर,तोला मार के खाही रे। कोन शिकारी हरय समझ ले,दाना कइसे फेके हे, जे हा जतका लालच करही,पहिली उही फँदाही रे। बन के जे हा जाँगर चोट्टा, फ़ोकट पा के खाही रे। जे जतका लालच मा परहीपहिली उही छँदाही रे। देख न बैरी आज शिकारीजंगल के रखवार बने, ओसरी पारी अवसर पा केसबला मार के खाही रे।

एक मुक्तक

सफर में बस चुनौती हो, न कोई भी बहाने हो। गगन के पार जाने तक उड़ाने ही उड़ाने हो। नए पँखो को मेरे बस नया तुम हौसला देना। शजर हो जो छितिज के पार मेरे आशियाने हो।

शिक्षक दिवस मुक्तक

212*4 चोट बाहर से भीतर सहारा दिया। जब भवँर में फँसा, तब किनारा दिया,  दूर मंजिल से   मैं जब भटक था गया,  आप ने उंगलियों का इशारा दिया। थक के हारा जो बाधा से डर कर रहा। जिसने हिम्मत न की वो  भी घर पर रहा। मैं गिरा और उठ कर चला ठौर तक,  आप का हाथ मेरे जो सर पर रहा। रोज उंगली पकड़ कर चलाया मुझे। गिर गया चोंट खा कर, उठाया मुझे। दौड़ता क्या कभी, हार कर हौसला, जीतना आप ही ने सिखाया मुझे। ना नयन झुक सके ना ये सर ही झुका। कारवां जो चला फिर कभी ना रुका। राह रोके बहुत दुश्मनो ने मगर, तीर सध कर निशाने से फिर ना चुका। देख ले तू भी सपना कहाँ पायेगा। हौसला तोड़ कर, मेरा ले जाएगा। ये सजर मेरे भीतर लगा वो गया, डाल काटो नया साख फिर आएगा।

मुक्तक : चलना सीख जाओगे

सुना करते हो क्यों इनकी,  ये कुछ क्या खास करते है। जो कुछ भी कर नहीं सकते,  वही बकवास करते है। लगाते है ये औरों पर  बड़े लाँछन लगाने दो, बुरा खाने से अच्छा है  चलो उपवास करते है। अगर खाने पे मन अटके  कभी उपवास मत करना। कभी छल कर किसी का मन, कहीं भी रास मत करना। तपोवन घर लगेगा जब  सरल मन ये तुम्हारा हो, हो मैला जब भी ये दर्पण,  किसी के पास मत करना। अगर घाटे का सौदा हो,  कभी व्यापार मत करना। नफा नुकसान जब सोचो, तो फिर तुम प्यार मत करना। जहाँ बेमोल बिक जाने से  तुझको भी लगे अच्छा,  ये सौदा कर तो सकते हो  मगर हर बार मत करना। गधे के सींग जैसे हैं  न जाने कब दिखाई दे। गले मिलने चले आते है, जब मतलब दिखाई दे। खुदा महफूज रक्खे तुमको  इन मक्कार यारों से, मेरे बेटे सम्हल कर चल  ये काँटे जब दिखाई दे। सहीं कहते थे बाबूजी,  खुसी औ गम नहीं होंगे। हमेशा एक जैसा कोई भी  मौसम नहीं होंगे। तुझे गिरना सम्हल जाना,  खुदी से सीखना होगा। ये उँगली थामने तेरा  हमेसा हम नहीं होंगे। निकल कर देख लो घर से सम्हलना सीख ...

मुक्तक

मुक्तक

कोई कितना भी पुकारे, पाँव पर हिलता नहीं। भीड़ है चारो तरफ पर आदमी मिलता नहीं। आज कल क्या हो गया है, बागबां को दोस्तों, खार है हर साख पर बस, गुल कोई खिलता नहीं।

मुक्तक

लगा कर आग लोगों ने भले सपने जला डाले। मुझे है हौसला देते ये मेरे पाँव के छाले। बुरी है आह बच कर चल किसी की बद्दुआओं से, कभी खुद टूट जाएंगे, घरों को तोड़ने वाले।

मुक्तक : घरों को तोड़ने वाले।

लगा कर आग लोगों ने भले सपने जला डाले। मुझे है हौसला देते ये मेरे पाँव के छाले। बुरी है आह बच कर चल किसी की बद्दुआओं से, कभी खुद टूट जाएंगे, घरों को तोड़ने वाले।

मुक्तक : मोर अँगरी धर चलव।

 एक दिन वो पार जाबो ये भरोसा कर चलव। पोठ रख विस्वास मन के छोड़ जम्मो डर चलव। मँय सुरुज के सारथी बन लड़ जहूँ अँधियार ले, जे विहिनिया चाहथे वो मोर अँगरी धर चलव।

मुक्तक

चरण की वंदना करके, नवा कर शीश बोलूंगा। सिया मजबूरियों ने था, ओठ वो आज खोलूंगा। मेरी हक की जो रोटी है मुझे देदो मैं भूखा हूँ, नहीं तो बाजुओं से फिर तेरी औकात तोलूँगा। तेरी कुर्...

देशभक्ति की शायरी

कि श्रम के माथ से टपके, जो पानी हो तो ऐसे हो । वतन पर जान दे दे जो, जवानी हो तो ऐसे हो। तिरंगा ओढ़ कर लौटा है जो ये वीर सरहद से हमें भी नाज है उन पर , कहानी हो तो ऐसे हो। वहाँ पत्थर नहीं ऐसा , न उनपर नाज करता है । गिरा कर खून मिटटी पर ,चमन आबाद करता है। नमन करने वो धरती पर , चढ़ा कर शीश आते हैं माँ के उन लाडलो को ये वतन भी याद करता है। 3 बुलंदी और भी  है बात उनकी पर निराली है. सहादत कर जो माटी चूमते है भाग्यशाली हैं, चमन का हर कली हर फूल उनका कर्ज ढोयेगा, लुटाया जान अपना इस वतन पर ये ही माली है  लुटा दी जान भारत पर, मैं उनका मान जगाऊँगा। सदा गुणगान गा कर, सोया स्वाभिमान जगाऊँगा। जगाऊँगा मैं राणा और शिवा के सन्तानो को, नरायण वीर जागेगा, मैं सोनाखान जगाऊँगा। सजाकर आर्थियां जिनकी तिरंगा मान देती है। सहादत देश पर ज़ब हो तो माँ सम्मान देती है. कि उन पर नाज करती है हिमालय की शिलाएं भी, चरण को चूम कर जिसके, जवानी  जान देती है। कोई दौलत पे मरता है, कोई शोहरत पे मरता है।  वतन से प्यार जो करता है, इसी चाहत पे मरता है। रहे खुशहाल मेरा देश औ देशवासी भी, अमर मरकर वो होता है कि जो भ...

मुक्तक

नजर में हो कोई परदा, नजारा हो तो कैसे हो ।। कोई जब डूबना चाहे , किनारा हो तो कैसे हो।। किसी के हो न पाये तुम, यहां पल भी मुहब्बत में,  बताओ तुम यहाँ कोई, तुम्हारा हो तो कैसे हो।

छडिकाएं

डूबने वाले को इतना सहारा तो है। पल दो पल साथ तेरे गुजारा तो है।। कही तो नाचती है मुस्कान की दुल्हन ओठ मेरा  न सही तुम्हारा तो है।

छडिकाएं

माली ही खुद अपना चमन बेचने लगे है। वतन के रखवाले ही वतन बेचने लगे है ।। आज के इस दौर में मुझे ये मलाल है कुछ कलमकार भी कलम बेचने लगे है।

मुक्तक

मुहब्बत एक फैशन है ,आजकल ज़माने में। नही दिल देखता कोई , लगे है तनको सजाने में।। बहुत आसान है पहली नज़र में दिल दे देना; पसीने छूट जाते हैं मगर रिश्ते निभाने में। कभी करता है दिल मेरा, कि मैं देवदास हो जाता ।। न पड़ता तेरे चक्कर में, तो कुछ ख़ास हो जाता ।। अगर होते सिलेबस में, तुम्हारे हुस्न के चर्चे; ये मुमकिन है परीक्षा में, मैं भी पास हो जाता ।। हर एक हार किसी जीत की शुरुवात  होती है ।। हर सुबह से पहले एक लम्बी रात होती है ।। जो हिम्मत हारते नहीं है गिर-गिर के राहों में; मुकद्दर में उन्ही के जीत की सौगात होती है ।। माली ही खुद अपना चमन बेचने लगे है। वतन के रखवाले ही वतन बेचने लगे है ।। आज के इस दौर में मुझे ये मलाल है कुछ कलमकार भी कलम बेचने लगे है।

मोर छत्तीसगढ़ी गीत: छत्तीसगढिया शायरी

  छत्तीसगढिया शायरी   1 . बहुत अभिमान मैं करथौ,   छत्तीसगढ के माटी मा । मोर अंतस जुड़ा जाथे,  बटकी भर के बसी मा। ये माटी नो हाय महतारी ये,   एकर मानतुम करव बइला आन के चरत हे,   काबर    हमर  बारी मा  ।   2 मै   तोरे  नाव लेहुँ,  तोरे गीत   गा के मर   जाहूं ।।  जे तै इनकार कर देबे,  त   मै   कुछु खा के मर जाहुं ।। अब तो लगथे ये जी जाही  संगी  तोर    मया मा, कहूँ इकरार कर लेबे    त मै  पगला के मर जाहुं ।।                       3 ये कइसे पथरा दिल ले मै ह  काबर प्यार कर डारेव ।। जे दिल ल टोर के कईथे का अतियाचार कर डारेव ।। नइ  जानिस वो बैरी हा  कभू हिरदे के पीरा ला  जेकर मया मय जिनगी ला  मै  अपन ख़्वार कर डारेव।।               ...

चौपाया नहीं

मै ये दावा नहीं करता कि कभी लडखडाया नहीं। मगर ये इल्जाम गलत है कि मुझे चलना आया नहीं।। अक्सर गिर जाता हूँ क्यों कि किसी के इशारे पे नहीं चलता ल मै आदमी हूँ मेरे दोस्त कोई चौपाया नहीं।।

प्यार मुहब्बत इश्क्

गरीब है यारों रो भी नहीं सकते ; लोग रोने का दूसरा मतलब निकाल लेंगे । मै मुहब्बत में हारा हु रोना चाहता हु लोग भूखा समझ कर सिक्कउछाल देंगे।। ये दुनिया है दोस्त पहले रुलायेंगे आपको आंशु पोछने को फिर कोई रुमाल देंगे ।। ये प्यार मुहब्बत इश्क है या की दुकानदारी । पहले ग्राहक देखेंग फिर तोल कर माल देंगे ।।

शेरोशायरी

   इतने हैं मिले जख्म के दिल तार तार है।   उसपे ये सितम, कहते है कहो न प्यार है।   कटेंगे   कैसे तू बता जिंदगी के चार दिन ,   न कोई आरजू है न किसी का  इंतजार है। हर एक हार किसी जीत की शुरुवात होती है। हर सुबह से पहली एक लम्बी रात होती है । जो हिम्मत हारते नहीं है गिर गिर के राहो में मुकद्दर में उनहीं जीत की सौगात होती है । 

जीत की सौगात

अन्नाजी को सलाम ! हर एक हार जीत की शुरुवात होती है ! हार सुबह से पहले एक लम्बी रात  होती है ! जो हार कर भी हि म्मत कभी हराते नहीं ; उन्ही के मुकद्दर में जीत की सौगात होती है !