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बड़े हो जाथे

पड़े पड़े सब पड़े हो जाथे  हर छोटू हा बड़े हो जाथे। जेन भरोसा  खुद मा करथे. एक दिन आगू खड़े हो जाथे। दे हुंकारू, सब बढ़िया हे, सवाल पूछना लड़े हो जाथे। हाथ उठा तँय बांध के मुटका, नइ ते मुद्दा सडे हो जाथे। वो डारा ला टूटना परथे  जेन ह ज्यादा कड़े हो जाथे।

मुक्तक छत्तीसगढ़ी

  पहिली जाल बिछाही पाछू, सुग्घर चारा डार दिही। तोरे राग म गाना गाही, मया के मंतर मार दिही। झन परबे लालच मा पंछी,देख शिकारी चाल समझ; फाँदा खेले हावय जे हा,अवसर पा के मार दिही। चारा के लालच देखाही, फांदा खेल फँदाही रे। झन बन जांगर चोट्टा बैरी,इक दिन जान ह जाही रे। रोज कमा के खाथन सँगी,स्वाभिमान से जीथन जी, माथ नवा जे तरुवा चाँटय,जूट्ठा पतरी पाही रे। चारा के लालच देखाही, फांदा खेल फँदाही रे। देख चिरइ तँय लालच झन कर,तोला मार के खाही रे। कोन शिकारी हरय समझ ले,दाना कइसे फेके हे, जे हा जतका लालच करही,पहिली उही फँदाही रे। बन के जे हा जाँगर चोट्टा, फ़ोकट पा के खाही रे। जे जतका लालच मा परहीपहिली उही छँदाही रे। देख न बैरी आज शिकारीजंगल के रखवार बने, ओसरी पारी अवसर पा केसबला मार के खाही रे।

गजल : रूठ कर मान जाने से क्या फायदा।

212 212 212 212। ऐसे झूठे बहाने से क्या फायदा। रूठ कर मान जाने से क्या फायदा। प्यार है दिल में तो क्यों न महसूस हो, है नहीं फिर जताने से क्या फायदा। थी जरूरत तभी आप आये नहीं,  आप के रोज आने से क्या फायदा। भूखे थे तब मिला दो निवाला नहीं, मर गयी भूख खाने से क्या फायदा। आ सके ना किसी के किसी काम के, फिर अमीरी दिखाने से क्या फायदा। धर पे है नहीं छाँव माँ बाप को, इतने पैसे कमाने से क्या फायदा।...

दु गीत मया के गावन दे।

दू गीत मया के गावन दे।  दू गीत मया के गावन दे। एक गीत यार जवानी के  जिनगी के प्यार कहानी के। एक गीत अमर बलिदानी बर। लहू डबकात जे रवानी बर। बिरवा मँय बोयें जिनगी भर,  अब फूल सहीं ममहावन दे। सब मीत मोर सब सँगवारी। जावत हावे आरी पारी। कब मोर बुलावा आ जाही। कब साँस कहाँ थीरा जाही। जब बोझ साँस के ढोवत हँव, मन के मनमीत सुनावन दे। कतको जाही कतको आही। कवि अपन पिरा ल गोहराही। ये दुनिया आनीजानी ये । जिनगी के इही कहानी ये। ये रंगमंच मा आज महुँ ला, रस घोरन दे बरसावन दे।

मुक्तक : मोर अँगरी धर चलव।

 एक दिन वो पार जाबो ये भरोसा कर चलव। पोठ रख विस्वास मन के छोड़ जम्मो डर चलव। मँय सुरुज के सारथी बन लड़ जहूँ अँधियार ले, जे विहिनिया चाहथे वो मोर अँगरी धर चलव।

अमृत ध्वनि छंद : मोर कराही

मोर कराही कस हृदय, सब बर हे अनुराग। माढ़े आगी के ऊपर, दबकावत हँव साग। दबकावत हँव, साग सबे बर, किसम किसम के। हरदी मिरचा, मरी मसाला, डारँव जमके। मन के भितरी,पोठ चुरत हे,  साग मिठाही। कलम ह करछुल, कविता मोरे,मोर कराही।

प्रसाद के पद : सखी री, जूते उनको मार

सखी री, जूते उनको मार। जो कर के वादा फिर मुकरे, गिन गिन के दे चार। लोकतंत्र को बना खिलौना, खेले बारम्बार। तन के उजले मन के काले, करते है मनुहार। पद-पैसे पर मोहित होकर, बिक जाते बाजार। लुटे निर्धन के धन को जो, और लाज को नार। सातो पुरखे तर जाएगे,  ऐसे कर बौछार। नियम नीति धर झोली में, दफ्तर में व्यापार। रिश्वत के ऐसे पंडो के, सारे भूत उतार। भ्रष्टाचारी जो अधिकारी, बने देश पर भार। नेताओ से गठबंधन कर,  बैठे है दरबार। भोली भाली भूखी प्यासी, जनता है लाचार। शासक हो गए अँधे बहरे, कौन सुने चीत्कार।

लेस दे जे घर अपन वो मोर सँग मा आय।

देख के रद्दा म काँटा मँय मढाथव  पाँव। अउ दही के भोरहा कपसा घलो ला खाँव। झन कहूँ बिजहा मया के बोंय के पछताय। लेस दे जे  घर अपन वो मोर सँग मा आय। फूल पर के भाग काँटा मोर हे तकदीर । मोर मन ला भाय सिरतों ये मया के पीर। रोय भीतर फेर बाहिर हाँस के मुस्काय। लेस दे जे  घर अपन वो मोर सँग मा आय। घाम सह के प्यास रह के जे नही अइलाय। जे भरोसा राम के तुलसी सहीं हरियाय। मोर बिरवा हा मया के रातदिन ममहाय।  लेस दे जे  घर अपन वो मोर सँग मा आय।

लेस दे जे घर अपन वो मोर सँग मा आय।

देख के रद्दा म काँटा मँय मढाथव  पाँव। अउ दही के भोरहा कपसा घलो ला खाँव। झन कहूँ बिजहा मया के बोंय के पछताय। लेस दे जे  घर अपन वो मोर सँग मा आय। फूल पर के भाग काँटा मोर हे तकदीर । मोर मन ला भाय सिरतों ये मया के पीर। रोय भीतर फेर बाहिर हाँस के मुस्काय। लेस दे जे  घर अपन वो मोर सँग मा आय घाम सह के प्यास रह के जे नही अइलाय। जे भरोसा राम के तुलसी सहीं हरियाय। मोर बिरवा हा मया के रातदिन ममहाय।  लेस दे जे  घर अपन वो मोर सँग मा आय।

अमृत धावनि छंद : काँटा

काँटा बोलय गोड़  ला, बन जा मोर मितान । नेता मन ला आज के, जोंक बरोबर जान । जोंक बरोबर, जान मान ये, चुहकय सबला। बन के हितवा, स्वारथ खातिर, लूटय हमला । धरम जात मा, काट काट के, बाँटय  बाँटा । आगुवाए ले, सदा गोड़ ला, रोकय काँटा । 

आल्हा : मुसवा

विनती करके गुरू चरण के, हाथ जोर के माथ नवाँव। सुनलो सन्तो मोर कहानी,पहिली आल्हा आज सुनाँव।। एक बिचारा मुसवा सिधवा, कारी बिलई ले डर्राय। जब जब देखे नजर मिलाके, ओखर पोटा जाय सुखाय।। बड़े बड़े नख दाँत कुदारी, कटकट कटकट करथे हाय। आ गे हे बड़ भारी विपदा,  कोन मोर अब प्रान बचाय।। देखे मुसवा भागे पल्ला, कोन गली मा  मँय सपटाँव। नजर परे झन अब बइरी के,कोन बिला मा जाँव लुकाँव। आघू आघू  मुसवा भागे ,  बिलई  गदबद रहे कुदाय। भागत भागत मुसवा सीधा, हड़िया के भीतर गिर जाय। हड़िया भीतर भरे मन्द हे, मुसुवा उबुक चुबुक हो जाय। पी के दारू पेट भरत ले,तब मुसवा के मति बौराय। अटियावत वो बाहिर निकलिस, आँखी बड़े बड़े चमकाय। बिलई ला ललकारन लागे, गरब म छाती अपन फुलाय। अबड़ तँगाये मोला बिलई , आज तोर ले नइ डर्राव। आज मसल के रख देहुँ मँय, चबा चबा के कच्चा खाँव। बिलई  सोचय ये का होगे, काकर बल मा ये गुर्राय। एक बार तो वो डर्रागे, पाछु अपन पाँव बढ़ाय।। बार-बार जब मुसवा चीखे , लाली लाली  आंख दिखाय। तभे बिलइया हा गुस्सागे, एक झपट्टा मारिस हाय। तर- तर तर -तर तेज लहू के,...