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आजकल

बुझाते हुए दिये भी सितारा लगे है आजकल।। मझधार भी जाने क्यू किनारा लगे है आजकल।। फूल हमेशा साथ देते नहीं यह जानकर काँटों का साथ ही प्यारा लगे है आजकल।। तुम कुछ सोचो मैं कुछ स...

जज्बात समझ लूंगा।

जो तुम्हारे दिल में होंगे, मैं वो जज्बात समझ लूंगा ।। जो तुम कह भी नहीं पाते मैं वो बात समझ लूंगा ।। तुम बादल हो चाहो जहाँ   पर बरस लेना ये पलकें भीग जाएँगी , मैं बरसात समझ लूंगा।। जिन्हें भी भूख लगाती है रोटी क्यू नहीं मिलती कोई ये बात समझा है जो मैं ये बात समझ लूंगा ।। अच्छा है मुझे देखकर तुम निगाहें फेर लेती हो कही तुम मुस्कुरा दोगी तो मैं सौगात समझ लूंगा ।। जो रात आये तो मेरी माँ तू मुझको सुला देना; मैं नादां हु रात को दिन, दिन को रात समझ लूंगा।। कहीं कोई भी गिर जाये मैं अक्सर दौड़ पड़ता हू ये ये उंगली कोई भी  पकड़े  मैं तेरा हाथ समझ लूंगा।। जब तक  दिल करे चलना,फ़िर रास्ता बदल लेना नसीब में लिखा था यहीं तक तेरा साथ  समझ लूंगा   ।।

मुझको जला देता है

वो थोडी सी चिंगारी लगा देता है ।। फि‍र धिरे-धिरे उसको हवा देता है ।। मैं गुगवाता हू सुलगता हू धधक उठता हू वो इस तरह से मुझको जला देता है ।। सेक लेता है अपने मतलब की रोटी फि‍र पानी डाल कर मुझको बुझा देता है ।। झुठ कोई भी बोले कितनी भी अदा से वक्‍त हक‍िकत से परदा हटा देता है ।।   कोई कि‍तना भी चाहे मगर वक्‍त आने पर वो अपनी औकात सबको द‍िखा देता है ।। मैं उसकी नि‍गाहों में चढ. कर भी क्‍या करू वो अपनी नि गाहों में ख्‍ाुद को गि‍रा देता है ।। प्रसाद मेरी रोटी को रखना सम्‍हाल कर भुख हर आदमी को रूला देता है ।।          मथुराप्रसाद वर्मा प्रसाद  

अपने हालत पे यूँ लाचार हो गए हैं.

अपने    हालात    पे    यूँ  लाचार    हो   गए    हैं . आम    थे    कभी , अब  आचार   हो   गए    हैं . अपनी  आजादी   पे   किसकी   नज़र   लगी   उम्र   भर   के   लिए   गिरफतार   हो   गए   हैं  .  भूख   लगी   हमने   तो     रोटी   क्या   मांग   ली , उनकी   निगाहों   में   गुनहगार   हो   गए   हैं  . वो   देने    आया   था   दर्दे दिल   का   दवा   हमें सुना   है   इन   दिनों   बीमार   हो   गया    हैं . सुना   है   कुछ   बेईमान   लोगों   ने   कैसे  , कुछ   जोड़   तोड़   की   है   ओर   सरकार   हो   गए   है   दु वा     मांगी   थी ...

करती है सरकार भैया।

करती है सरकार भईया !! आज कल व्यापार भईया !! इन्हें तो बस वोट चाहिए देश  का  बँटाधार भईया !!  गुंडे, मवाली,छुटभइयों से  संसद है लाचार भईया !! किसे  पड़ी है सच बोलेगा  कौन सहेगा मार  भईया !!

इशारे से कभी बुलाये तो कोई !!

छुप के देखे नजरें झुकाये तो कोई । कर इशारा हमे भी बुलाये कोई। टूट जाने दे इसका हमें गम नहीं, एक हंसी ख्वाब हमको दिखाए कोई। बस इस उम्मीद में मैं रोया करूँ, रूठ जाऊं तो आके मनाये कोई । मेरी आँखों में सपने तलाशा करे, कभी तैर कर डूब जाये कोई। न आये,पर आने की उम्मीद तो हो, कर के वादा मुझको बहलाए कोई । मैं भी किस्से कहूँ दिल के हालात को, बात को जो हर एक उड़ाए कोई।

मुझको उम्मीदों का उजाला देती जा !

मुझको उम्मीदों का उजाला  देती जा । कोई तो निशानी प्यार वाला  देती जा । मै उम्रभर तेरा इंतजार कर सकता  हूँ ; तू लौट आने का हवाला देती जा । किसी मयकस को प्यासा  लौटते नहीं ; आ गया हूँ तेरे दर पे , इक प्याला देती जा । फिर न पिऊंगा किसी मयखाने में कभी तू आज अपनी नैनो की मधुशाला देती जा । वो तेरी हर भूख मिटा देगा देखना ; तू भूखे बच्चे को निवाला देती जा !

इंसान नही होते।

हिन्दू नहीं होते वो मुसलमां नहीं होते ! जो खून से खेलते है इन्सां नही होते !! ऐसे उजाले से तो अँधेरा ही है बेहतर जो घर को जला दे वो समां नहीं होते !! चला आता है बुडापा बेवक्त उनके पास कुछ बच्चे मेरे गांव के क्यों जवाँ नहीं होते !! मजहब के नाम पे जो बताते है इनसानों को वो  मुल्क के दुश्मन है मेहमां नहीं होते !! ये अमन नहीं होता ये चमन नहीं होते गर हौसलों में अपने तुफां नहीं  होते !!

जिगर पीते है.

हम जुदाई में गम का जहर पीतें है । रोकती है ये दुनियाँ  मगर पीतें है । कौन कहता है हाथों में शराब है , घोल कर जाम में हम जिगर पीते है। कभी कभी सारा सहर लड़खड़ाता है  उनके यादों में हम इस कदर पीतें है । होश आता नहीं बिन पिये इसलिए, यारो हम अब साम ओ सहर पीतें है , किसे  है प्रसाद चाहत तेरे जीने की, हर अंजाम से हो हम बेखबर पीते है ।

तेरी गम ए जुदाई पी ली .

तेरी गम ए जुदाई पी ली . तुने जो पिलाई पी ली. लोग कहते रहे शराब,  हमने समझ के बेवफाई पी ली . कभी ज्यादा पी, कभी  कम  पीया . कभी ख़ुशी पी  कभी गम पीया    जब भी तेरी याद आई पी ली  कभी गैरों ने , कभी आपनों  ने  कभी हकीकत,कभी सपनों ने  जब भी हमें सताई पी ली . क्या बुरा किया जो  पीया  मैंने  तुझे याद कर जो जिया मैंने  तुने जीतनी पिलाई पी ली 

छोटा आदमी हूँ छोटी बातें करता हूँ !

मैं   कहाँ    किसी   से   झूठे   वादे   करता   हूँ  ! छोटा   आदमी   हूँ   छोटी   बातें   करता   हूँ ! पसीने   में   पिघलाता   हूँ   अपने   तन   को   मैं   अपने   दिन   को   यूँ  ही    राते   करता   हूँ ! आने   वाले   कल   की   मूरत   गढ़ना   चाहता   हूँ मैं   तकदीर   पर   हथोड़े   से   घातें   करता   हूँ ! कौन   रखता   हैं   खंजर   बगल   में   क्या   जानूं मैं   तो   हंस   के   सबसे   मुलाकाते   करता   हूँ मैं   चाँद   को   अपना   पेट   दिखा   कर रोटियों   में   चाँद   तारों   के   नज़ारे   करता   हूँ! खुद  ही  खोया   रहता   हूँ लहरों में कहीं और ,  दूसरों के किस्तियों को किनारे करता हूँ! 

भला सा आदमी हूँ

  बहरे रमल मुसद्दस सालिम फ़ाइलातुन, फ़ाइलातुन, फ़ाइलातुन 2122, 2122, 2122   आदमी हूँ मैं भला  सा आदमी हूँ. हाथ अपनों के छला  सा  आदमी हूँ ।  फूँक कर  के छाछ  पीता  हूँ मगर क्यों  दूध से  फिर भी जला  सा आदमी हूँ ।  रात आहट  सुन जरा सा कांप  जाता  मै उजालों से डरा सा आदमी हूँ ।  इन दिनों हूँ मैं खजूर पर लटक रहा आसमानो  से  गिरा सा आदमी हूँ  ।  भाग कर दुनियां कहाँ  तक आ गई है मैं किनारे पर खड़ा  सा आदमी हूँ  ।  रोटियों  ने नींद रातों  की   उड़ा दी  भूख मरता  मैं  दला  सा आदमी  हूँ ।  एक ठोकर  मार तू भी  माथ  मेरे   पाँव तेरे  मैं पड़ा  सा आदमी हूँ।          ------- मथुरा प्रसाद वर्मा 'प्रसाद''