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"अब सब कुछ है"




एक बात याद है...
जो बरसों बाद भी
यादों की दीवारों से टकराकर
लौट आती है।

तुम्हारी वही हँसी...

जब तुम उँगलियों पर
घर का हिसाब गिनती थीं—

"गैस चूल्हा चाहिए...
फ्रिज चाहिए...
वॉशिंग मशीन चाहिए...
वरना तुमसे शादी नहीं करूँगी..."

और मैं...
अपनी खाली जेबों में
भरे हुए सपनों को टटोलकर
मुस्कुरा देता था।

तुम्हें लगता था,
मैं बात टाल रहा हूँ।

मुझे लगता था,
तुम साथ निभा रही हो।

फिर एक दिन
न जाने किस मोड़ पर
हम दोनों के रास्ते
एक-दूसरे से माफ़ी माँगे बिना
अलग हो गए।

उसके बाद
मैंने कमाया...
बहुत कमाया।

एक-एक करके
घर की हर कमी भरता गया।

रसोई में गैस जल उठी,
कोने में फ्रिज आ गया,
आँगन में वॉशिंग मशीन भी मुस्कुराने लगी।

घर में
सुविधाएँ बढ़ती रहीं...

और भीतर
तुम्हारी कमी।

अब सुबह
खिड़की से आती
धूप की पहली किरण
जब घर के आँगन पर पड़ती है,
तो चमक तो बहुत होती है...

मगर उजाला नहीं।

तब समझ आता है—
किसी किरण का आना 

और ठहर जाना कहीं,

दो अलग-अलग बातें हैं।

लोग कहते हैं—
"देखो,
अब तो सब कुछ है तुम्हारे पास।"

मैं हँस देता हूँ।

कौन समझाए उन्हें,
कुछ लोग
घर नहीं छोड़ते,
वे हर चीज़ में
अपनी जगह छोड़ जाते हैं।

आज भी
इन चीज़ों को देखते हुए
तुम्हारी आवाज़ सुनाई देती है।

लगता है,
तुम अभी कहोगी—

"देखा...
आख़िर सब ले ही आए।"

हाँ...

सब ले आया।

बस एक तुम्हें
समय की दुकान से
फिर कभी नहीं ला सका।

यही मेरी सबसे बड़ी कमी है,
और शायद...

और शायद...यही 

मेरा सबसे बड़ा प्रसाद भी—

कि मैंने मोहब्बत खोई है,
पर उसकी याद नहीं।

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