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सच होंगे कभी सपने भी हमारे देखना ।।

चमकेंगी किसी दिन, ये सितारे देखना। सच होंगे कभी सपने भी हमारे देखना। देखना उनको मेरा ,  इस तरह देखना , किसी डुबते का जैसे कि किनारे देखना। जब तुमको ठुकरा देगा कोई तुम्हारे जैसा काम आयेंगे हम ही तुम्हारे देखना।। फांकाकशी  देती है बड़ी सकूँ भी जिंदगी में, कभी बनकर मेरी तरह बंजारे देखना। मुझे जब भी देखा तुमने मेरे ऐब ही देखा एक सितम है आधे नज़ारे देखना।। उनकी आरजू न कर  तेरे जो न हो सके , छोड़ दो  ' प्रसाद ' दिन में तारे देखना। - मथुरा प्रसाद वर्मा " प्रसाद http://sivprasadsajag.blogspot.in/

तब आकर देना मुझे नए साल की मुबारकबाद !

  नया साल आया,  लोगो ने मनाई खुसियाँ ।। मगर, क्या भूला पायेगे हम , पिछले वर्ष की त्रासदियाँ ।।  लोग चाहे जैसे भी दे ले मुबारकबाद ।  मगर मुझको आ ही जाएगी इनकी याद ।  सच कहना मेरे दोस्त ,  कलेन्डर के अलावा और क्या बदला है ।  वही एक ओर गरीबी है , बेबसी है ,  भूख और प्यास है ।  दुसरी ओर  सुख है, समृद्धी है , ऐश्वर्य और विलास है ।  इसी लिए तो मैं कहता हूँ मेरे दोस्त , जब भूखा न हो कोई बचपन ,  ममता बेबस न हो , ईन्सानी भेडियों से महफुज हो  हर बहना की लाज ।।  तब आकर देना मुझे , नए साल की मुबारकबाद ।। - मथुरा प्रसाद वर्मा ''प्रसाद''

अपने हालत पे यूँ लाचार हो गए हैं.

अपने    हालात    पे    यूँ  लाचार    हो   गए    हैं . आम    थे    कभी , अब  आचार   हो   गए    हैं . अपनी  आजादी   पे   किसकी   नज़र   लगी   उम्र   भर   के   लिए   गिरफतार   हो   गए   हैं  .  भूख   लगी   हमने   तो     रोटी   क्या   मांग   ली , उनकी   निगाहों   में   गुनहगार   हो   गए   हैं  . वो   देने    आया   था   दर्दे दिल   का   दवा   हमें सुना   है   इन   दिनों   बीमार   हो   गया    हैं . सुना   है   कुछ   बेईमान   लोगों   ने   कैसे  , कुछ   जोड़   तोड़   की   है   ओर   सरकार   हो   गए   है   दु वा     मांगी   थी ...

हे भगवन इन्हें बुद्धि दे !

हे भगवन इन्हें बुद्धि दे  ये आदमी आपस में लड़ते है  आदमी हो कर आदमी का खून चूसते है  आदमी हो कर आदमी को लुटते है ये क्यों अलग अलग नाम से  टूटते है !  एक एक साँस   के लिए  घुटते है !  हे भगवन इन्हें बुद्धि दे !

छोटा आदमी हूँ

ये मेरे बाबूजी है ; मेरी ये कविता उनके संघर्ष ,  सरलता  और  साहस   भरे  जीवन  को  समर्पित है  ! मैं   कहाँ    किसी   से   झूठे   वादे   करता   हूँ  ! छोटा   आदमी   हूँ   छोटी   बातें   करता   हूँ ! पसीने   में तन को    पिघलाना जनता    हूँ,   मैं   अपने   दिन   को   यूँ  ही   राते   करता   हूँ ! आने   वाले   कल   की   मूरत   गढ़ना   चाहता   हूँ मैं   तकदीर   पर   हथोड़े   से   घातें   करता   हूँ ! कौन   रखता   हैं   खंजर   बगल   में   क्या   जानूं मैं   तो   हंस   के   सबसे   मुलाकाते   करता   हूँ मैं   चाँद   को   अपना   पेट   दिखा  दिखा  कर, रोटियों   में   चाँद   तारों   के   नज़ारे   करता  ...

आम आदमी

वो रोयेगा, चीखेगा और कभी चिल्लाएगा !! तड़प - तड़प के किसी दिन मर जायेगा !! वो आम आदमी है  सुनेगा उसकी कौन ? कौन उसकी बात पे अपना सर खापयेगा !! बच ही जायेंगे गुनहगार जैसे तैसे ; वो अपनी बेगुनाही की सजा पायेगा !! सब फिरते है यहाँ कालिख लेकर मेरे दोस्त ; तू अपने दमन को कहाँ कहाँ बचाएगा !! मेरे महबूब को तुम देख का पहचानना; मेरे ज़ख्म  देखकर वो मुस्कुराएगा !! वो रोटी मांगता हुआ भूख से मर भी गया ; देखना गुन्हगारों में उसका नाम  भी  आएगा !!

मत अकड़, झुक !

सरफरोशों की प्रजातियाँ विलुप्त हुईं , आंधियां तेज़ है मत अकड़, झुक !! सर सलामत रहा तो फिर देखा जायेगा ; सर उठाने  का वक्त  अभी आएगा रुक !! महफ़िल  में मची है अभी कौओ की काँव-काँव; कौन सुनेगा यहाँ कोयल की कुक !! इसलिए की अखबारों की सुर्खियों में नाम हो ; गिरेबान मत झांक , आसमान में थूक !! शेर की दहाड़ अब पिंजरों में कैद है ; कुत्ते की तरह  , भूक सके तो भूक !! रोटियां जिनके लिए फकत खेलने  की चीज़ है; वो क्या जाने किसी बच्चे  का  भूख  !! आज कल मुह खोलन भी तो एक जुर्म हो गई है झूठ न कह सको तो रहो सदा मूक !! लो सबक अब भी उनकी मक्कारियों से ' प्रसाद' जिनकी तिजोरी  में बंद है ज़माने का सुख !!