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क्या क्या करें क्या न करें

क्या क्या करें क्या क्या न करें?  हमने उनपे सब  छोड़ा  है ; जो करना है वो खुदा करे.   बचपन की उखड्ती साँसे हैं। ममता की बेबस आँखें है। वो फिर भी महल बनायेंगे, कोई मरता है तो मारा करे.   यहाँ खून से आटा सनती है, तब जाकर रोटी बनती है. हर दाने पे पहरें बैठें है, जिन्हें भूख लगे वो दुआ करे.   जब जुल्म की आंधी चलती है इंसाफ कुचल  दी जाती है. यहाँ न्याय गवाही मांगेगी , अन्याय भले ही हुवा करे.

ऐ मेरी कविता !

ऐ मेरी कविता ! ऐ मेरी कविता  ! मैं सोचता हूँ लिख डालूं , तुम पर भी एक कविता !  रच डालूं  अपने बिखरे कल्पनाओं  को  रंग डालूं  स्वप्निल इन्द्र धनुषी रंगों से, तेरी चुनरी ! बिठाऊँ शब्दों की डोली में  और उतर लाऊँ  इस धरा पर ! किन्तु मन डरता है  ह्रदय सिहर जाता है , तुम्हे अपने घर लाते हुए ! की कहीं तुम टूट न जाओ  उन सपनों की तरह  तो बिखर गए टूट कर !

पलके बिछाएं हूँ अब तक !

उनके चाहत के सपने सजाएँ हूँ अब तक । उनके यादों को सीने में बसाये हूँ अब तक । वो मासूम चेहरा, वो झील सी गहरी आँखें ; वो उनका मुस्काना ,वो उनका शर्माना, भोली सूरत को आँखों में छुपाये हूँ अब तक ! छुप-छुप के हमसे निगाहें मिलाना  फिर  हथेली से अपना सहारा छुपाना ; कुछ भी तो नहीं भुला पाए हूँ अब तक ! वो जागी जागी रातें , वो तेरी सारी बातें ; वो जुदाई के दिन , और वो मुलाकातें ; उन्ही यादों में कहाँ सो पाए हूँ अब तक ! प्यासी-प्यासी सी मेरी भीगी  निगाहें ; तकती रहती है तेरी वो सुनी राहें ;  तेरी राहों में पलके बिछाएं हूँ अब तक !