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संदेश

मसिहा

जब जब लोगो पर हुए अत्याचार लोगो ने लगाई गुहार सर पर कफन बांधे आया मसिहा और लडता रहा लोगो के लिए दिन रात । सहता रहा आघात पत्थरों के चुना जाता रहा दिवारों पर चढता रहा सुलियों पर छलनी होता रहा गोलियों से बार बार । लोग बने रहे तमाशाबिन बैठे रहे चुपचाप  छटपटाते हुए देखते रहे  मसिहा को जुल्म बढता रहा हर रोज। और जब  मर गया मसिहा लोग करने लगे इंतिजार फिर एक बार और किसी मसिहे की  मसिहाआएगा  ओर हमें बचाएगा बार- बार, बार- बार, बार- बार

चौपाया नहीं

मै ये दावा नहीं करता कि कभी लडखडाया नहीं। मगर ये इल्जाम गलत है कि मुझे चलना आया नहीं।। अक्सर गिर जाता हूँ क्यों कि किसी के इशारे पे नहीं चलता ल मै आदमी हूँ मेरे दोस्त कोई चौपाया नहीं।।

अच्छा नहीं लगता।।

तेरे ख्यालों में इस कदर खोया रहता हूँ; कि तू भी आये तो अच्छा नहीं लगता।। मेरा ख्वाब है मुझे देख तो लेने दे; कोई जगाये तो अच्छा नहीं लगता।। अब अँधेरे कि आदत हो गई मेरे घर को; कोई दीप जलाये तो अच्छा नहीं लगता।। तू मनाता है इसलिए तो रूठ जाता हूँ; कोई और मनाये तो अच्छा नहीं लगता।। ये माना मेरे गीत है फिर भी बेवक्त कोई गाये तो अच्छा नहीं लगता।। वो हँसते है बहुत मेरे आशुओं पर प्रसाद' मुस्कुराये तो अच्छा नहीं लगता ।।

करती है सरकार भैया।।

करती है सरकार भईया।। आजकल व्यापार भईया।। इन्हें तो बस वोट चाहिए। देश का बंठाधार भईया।। गुंडे मवाली छुटभैयों से संसद है लाचार भईया। किसे पड़ी है सच बोलेगा कौन सहेगा मार भईया। आपस में सब तने पड़े है खिची हुई  तलवार भईया। प्यार करेगा छूप छुप के गर पकड़ा गया बलात्कार भैया।

धीरे धीरे

उठने लगे है कदम धीरे धिरे। ये कहां जा रहे है हम धीरे धीरे। नफरतें बढ़ी है मगर क्यों दिलों में मुहब्बत हुई है कम धीरे धीरे।। हमने सहा है हम ही सहेंगे सनम तू करले सितम धीरे धीरे।। मेरे बिश्वास को किया तार तार, आज खा रहे है कसम धीरे धीरे।। वो जब मुस्कुराये तुम ये समझाना निकलने लगा है मेरे दम धीरे धीरे।। प्रसाद' ख्याल रखना वो  दर्द लगायेगे फिर मरहम धीरे धीरे।। यही जिन्दगी है तो मेरे मौत मुझपे करता नहीं क्यों रहम धीरे धीरे।।

क्या क्या करें ?

क्या क्या करें क्या क्या न करें । हमने उनपे सब छोड़ा है जो करना है वो खुदा करे । बचपन की उखड़ती सांसे है। ममता की बेबस आँखें है। वो फिर भी महल बनायेंगे; कोई मरता है तो मरा करे । यहाँ ख़ून से आटा सनती है। तब जाकर रोटी बनती है। हर दाने पर पहरे बैठे है; जिन्हें भूख लगे वो दुवा करे। जब जुल्म की आंधी चलती है। इन्साफ कुचल दी जाती है। यहाँ न्याय गवाही मांगेगी; अन्याय भले ही हुआ करे। यहाँ सच हमेसा हरता है। और झूठ ही बजी मरता है। "प्रसाद"मगर सच बोलेगा; कोई सुने या अनसुना करे।। - मथुरा प्रसाद वर्मा'प्रसाद'

सर्दी बड़ी बेदर्दी

नाक आखिर नाक है; बहे नहीं तो करे क्या? रुमाल  गन्दा न  करे; तो कोई मरे क्या? आजाये आनी अगर है; यूँ तड़पाती है क्यों? एक मीठा दर्द बनकर सर पे चढ़ जाती है क्यों? ये जो अपनों छिक है ये बड़ी ढी ठ है। नाक पर आ कर अगर न आए तो करे क्या? ये एक ऐसा मर्ज है; सच बड़ा  ख़ुदगर्ज है। नाक पे है नकचड़ी । सिर का सिरदर्द है। न चैन दे पल भर न रात को नीद दे खर्राटे सुन क्र रात भर कोई न डरे तो डरे क्या?