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संदेश

मुक्तक : मोर अँगरी धर चलव।

 एक दिन वो पार जाबो ये भरोसा कर चलव। पोठ रख विस्वास मन के छोड़ जम्मो डर चलव। मँय सुरुज के सारथी बन लड़ जहूँ अँधियार ले, जे विहिनिया चाहथे वो मोर अँगरी धर चलव।

अमृत ध्वनि छंद : मोर कराही

मोर कराही कस हृदय, सब बर हे अनुराग। माढ़े आगी के ऊपर, दबकावत हँव साग। दबकावत हँव, साग सबे बर, किसम किसम के। हरदी मिरचा, मरी मसाला, डारँव जमके। मन के भितरी,पोठ चुरत हे,  साग मिठाही। कलम ह करछुल, कविता मोरे,मोर कराही।

छत्तीसगढ़ी गजल : बेंच दे है सब कलम बाजार मा।

कोन लिखथे साँच अब अखबार मा। बेंच दे हे सब कलम बाजार मा। नाँव के खातिर मरे सनमान बर। रेंगथे कीरा सहीं दरबार मा। साँच बोले के जुलुम होगे हवे। काट मोरो  घेंच ला तलवार मा। हाँ तहूँ जी भर कमा ले लूट ले, तोर मनखे बइठगे सरकार मा। तँय कहूँ ला सोज रद्दा झन बता,  जे भटकथे घर बनाथे खार मा। तँय मसाला डार जे जतका मिले, नून कमती नइ चलय आचार मा।

प्रसाद के पद : सखी री, जूते उनको मार

सखी री, जूते उनको मार। जो कर के वादा फिर मुकरे, गिन गिन के दे चार। लोकतंत्र को बना खिलौना, खेले बारम्बार। तन के उजले मन के काले, करते है मनुहार। पद-पैसे पर मोहित होकर, बिक जाते बाजार। लुटे निर्धन के धन को जो, और लाज को नार। सातो पुरखे तर जाएगे,  ऐसे कर बौछार। नियम नीति धर झोली में, दफ्तर में व्यापार। रिश्वत के ऐसे पंडो के, सारे भूत उतार। भ्रष्टाचारी जो अधिकारी, बने देश पर भार। नेताओ से गठबंधन कर,  बैठे है दरबार। भोली भाली भूखी प्यासी, जनता है लाचार। शासक हो गए अँधे बहरे, कौन सुने चीत्कार।

छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल - रोज सुध कर के जेकर छाती जरे

  2122  2122   212 रोज सुध कर के जेकर छाती जरे। नइ फिरय वो फेर अब बिनती करे। कोन बन मा जा भटक गे राह ला  रेंगना आइस जिखर अँगरी धरे। तँय लगा बिरवा मया के चल दिये, देख आ के वो कतक फूले फरे । हे अँजोरी घर म तोरे नाँव ले,  जोत अँगना मा बने रोजे बरे । जब गिरे के बाद कोनो थामथे जान लेथव हाथ वो तोरे हरे।

लेस दे जे घर अपन वो मोर सँग मा आय।

देख के रद्दा म काँटा मँय मढाथव  पाँव। अउ दही के भोरहा कपसा घलो ला खाँव। झन कहूँ बिजहा मया के बोंय के पछताय। लेस दे जे  घर अपन वो मोर सँग मा आय। फूल पर के भाग काँटा मोर हे तकदीर । मोर मन ला भाय सिरतों ये मया के पीर। रोय भीतर फेर बाहिर हाँस के मुस्काय। लेस दे जे  घर अपन वो मोर सँग मा आय। घाम सह के प्यास रह के जे नही अइलाय। जे भरोसा राम के तुलसी सहीं हरियाय। मोर बिरवा हा मया के रातदिन ममहाय।  लेस दे जे  घर अपन वो मोर सँग मा आय।

लेस दे जे घर अपन वो मोर सँग मा आय।

देख के रद्दा म काँटा मँय मढाथव  पाँव। अउ दही के भोरहा कपसा घलो ला खाँव। झन कहूँ बिजहा मया के बोंय के पछताय। लेस दे जे  घर अपन वो मोर सँग मा आय। फूल पर के भाग काँटा मोर हे तकदीर । मोर मन ला भाय सिरतों ये मया के पीर। रोय भीतर फेर बाहिर हाँस के मुस्काय। लेस दे जे  घर अपन वो मोर सँग मा आय घाम सह के प्यास रह के जे नही अइलाय। जे भरोसा राम के तुलसी सहीं हरियाय। मोर बिरवा हा मया के रातदिन ममहाय।  लेस दे जे  घर अपन वो मोर सँग मा आय।