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संदेश

रूपमाला

तुम किरण थी  मैं अँधेरा, हो सका कब  मेल। खेल कर  हर बार हारा, प्यार का ये खेल।। नैन उलझे  और सपने , बुन सके  हम लोग। आज भी लगता नही ये, था महज संजोग।1। मैं जला जलता  रहा हूँ,  रात भर अनजान। आप रोटी सेंक अपना, चल दिये  श्रीमान।। मैं सहूँगा हर सितम को , मुस्कुराकर यार। आप ने मेरी मुहब्बत, दी बना बाजार।2।

कोई हादसा हो गया होगा ।

कोई हादसा हो गया होगा । वो चलते-चलते सो गया होगा । बदहवास गलियों में फिरता है, कोई अपना खो गया होगा । मेरे दुशमनों को फुरशत कहाँ है, कोई दोस्त ही कांटे बो गया होगा । वो आज-कल मुंह छिपाता फिरता है। रूबरू आईने से हो गया होगा । प्रसाद' मेरा कफन अब भी गिला है, कोई छुप-छुप के रो गया गया होगा !

मुक्तक

तुझको खयालो में सही कुछ तो मैंने पाया था। ख्वाब टूटा तो ये जाना कि वो  तेरा साया था। तू चला जा कि अब मैं लौट कर न जाऊंगा, मैं तेरे साथ बहुत दूर चला आया था।

काम आया है

सुबह का भुला शाम आया है। हो करके बदनाम आया है। सियासत का रोग लगा था, करके सारे काम आया है। आस्तीन में छुरी है पर, मुँह पर अल्ला राम आया है। किस किस को लगाया चुना, बना के झंडुबाम आया है। खादी तन पर पहन के घुमा, होकर नँगा  हमाम आया है। वादे बड़े बड़े करता है, कभी किसी के काम आया है? अब के किसको चढ़ाएं सूली पहले मेरा नाम आया है। प्रसाद' रखता जेब में रोटी, क़बर में जा काम आया है। मथुरा प्रसाद वर्मा 'प्रसाद'

देशभक्ति की शायरी

कि श्रम के माथ से टपके, जो पानी हो तो ऐसे हो । वतन पर जान दे दे जो, जवानी हो तो ऐसे हो। तिरंगा ओढ़ कर लौटा है जो ये वीर सरहद से हमें भी नाज है उन पर , कहानी हो तो ऐसे हो। वहाँ पत्थर नहीं ऐसा , न उनपर नाज करता है । गिरा कर खून मिटटी पर ,चमन आबाद करता है। नमन करने वो धरती पर , चढ़ा कर शीश आते हैं माँ के उन लाडलो को ये वतन भी याद करता है। 3 बुलंदी और भी  है बात उनकी पर निराली है. सहादत कर जो माटी चूमते है भाग्यशाली हैं, चमन का हर कली हर फूल उनका कर्ज ढोयेगा, लुटाया जान अपना इस वतन पर ये ही माली है  लुटा दी जान भारत पर, मैं उनका मान जगाऊँगा। सदा गुणगान गा कर, सोया स्वाभिमान जगाऊँगा। जगाऊँगा मैं राणा और शिवा के सन्तानो को, नरायण वीर जागेगा, मैं सोनाखान जगाऊँगा। सजाकर आर्थियां जिनकी तिरंगा मान देती है। सहादत देश पर ज़ब हो तो माँ सम्मान देती है. कि उन पर नाज करती है हिमालय की शिलाएं भी, चरण को चूम कर जिसके, जवानी  जान देती है। कोई दौलत पे मरता है, कोई शोहरत पे मरता है।  वतन से प्यार जो करता है, इसी चाहत पे मरता है। रहे खुशहाल मेरा देश औ देशवासी भी, अमर मरकर वो होता है कि जो भ...

एक सच

सुन कर आश्चर्य होगा मुझे ज्यादातर कविताएं तब सूझती है जब मैं टॉयलेट सीट पर बैठा होता हूँ। और वहाँ से उठकर , कागजपर लिखकर मैं  हल्का बहुत हल्का होता हूँ।

इंसानियत कहाँ खो गया ?

उस दिन बड़ा अजीब  हादसा हुआ मेरे साथ। मैंने कुछ पर्ची में विरुद्धर्थी शब्द लिख कर बच्चो में बाट दिया। कहा - अपने अपने उलटे अर्थ वाले शब्द जिनको मिले है खोज लो। कुछ देर तक बच्च...