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संदेश

मेरी कविता !

ऐ मेरी कविता ! मैं सोचता हूँ लिख डालूं , तुम पर भी एक कविता ! रच डालूं अपने बिखरे कल्पनाओं को रंग डालूं स्वप्निल इन्द्र धनुषी रंगों से, तेरी चुनरी ! बिठाऊँ शब्दों की डोली में और उतर लाऊँ इस धरा पर ! किन्तु मन डरता है ह्रदय सिहर जाता है , तुम्हे अपने घर लाते हुए ! की कहीं तुम टूट न जाओ उन सपनों की तरह तो बिखर गए टूट कर !

क्या-क्या करें ?

क्या-क्या करें  ? क्या-क्या न करें  ? हमने उनपे सब छोड़ा है,   जो करना  है खुदा करें। बचपन की उखड़ती साँसे हैं। ममता की बेबस आँखें है। वो फिर भी महल बनायेंगे, कोई मरता है,तो मरा करें। यहाँ खून से आंटा सनती है। तब जाकर रोटी बनती  है। हर दाने पर पहरे बैठें हैं, जिन्हें भूख लगे वो दुवा करें। जब जुल्म की आँधी चलती है। इंसाफ कुचल दी जाती  है। यहाँ न्याय गवाही मांगेगी, अन्याय भले ही हुआ करें। यहाँ  सच्चा हमेशा हरता है। और झूठा  बाजी  मरता है। 'प्रसाद" मगर सच बोलेगा, कोई सुने या अनसुना  करे ।

मोल !

कभी जनता, कभी सरकार बिकता है । कभी कुर्सी , कभी दरबार  बिकता है । हर चीज है यहाँ बिकाऊ दोस्तों ; कोई छुप कर, कोई सरेबाजार  बिकता है । कभी शहर-शहर ,कभी गाँव-गाँव  बिकता है । कोई किलो-किलो ,कोई पाव-पाव   बिकता है । हर चीज की अलग-अलग कीमत है मित्रों; कोई कौड़ियों में,कोई करोडो के भाव  बिकता है । कही खून, कहीं पसीना आज  बिकता है । कहीं पत्थर कहीं सोना कहीं ताज  बिकता है । सब कुछ तो लोग खरीदते है यारों ; तभी तो माँ-बहनों का लाज  बिकता है । कहीं खस्सू, कहीं खुजली, कहीं दाद  बिकता है । कभी दवा , कभी दारू, कभी इलाज  बिकता है । लोकतंत्र हो जाता है बीमार मेरे साथी ; जब अखबार वालों का आवाज  बिकता है । कोई ख़ुशी-ख़ुशी, कोई होकर मजबूर  बिकता है । कोई अपनों के लिए,होकर दूर  बिकता है । तकदीर के तराजू में तूल जाता है हर आदमी   आदमी है तो  जिंदगी में जरुर  बिकता है ।                                          मथुरा ...

कर्तव्य पथ पर !

सिद्धांतो के जरजर सड़क पर  पुराने सिलेपर की तरह  बीना थके निरन्तर घिस रहाँ हूँ ! तले वही हैं, सिर्फ फीते बदल-बदल कर वक्त की बेरहम चक्की में  पिस रहा हूँ ! शानदार हाइवे पर  द्रुत गति से  वे दौड़तें हैं !  और मुझपर  कलंक से काले धुवें छोड़तें है ! मुझे पछाड़ते  निज कर्कश स्वर में चिढातें है  किन्तु कुछ दूर जाकर  वो रुक जाते है ! मगर मैं  मगर मैं फिर भी चलता रहता हूँ , बिना थके निरंतर  कछुए की चाल  से  अपने कर्तव्य पथ पर !

कौन ले जाता है सबेरा छीन कर गावों से !

सूरज  निकलता रहा हर दिन  हर दिन लाल होता रहा आकाश  पक्षी चहकते रहे' हवाएं चलती रही  झूमती  रही डालियाँ । उठता रहा धुवां  सुलगती रही चिमनियाँ चीखते रहे भोंपू  दौड़ता रहा सड़क। मगर क्यों  अब भी अँधेरा है  मेरे गाँव में ? गाँव की पगडंडीयां क्यूँ नहीं सिख।पाई रेंगना ? क्यूँ नहीं जले चूल्हे  अब तक झोपड़ों में ? उजाला क्यों नहीं आता  आखिर गावों में ? क्या कभी न आएगा सूरज  गावों में ? मैं चिंतित हूँ ! कौन ले जाता है सबेरा  छीन कर गावों से ? मथुरा प्रसाद वर्मा 'प्रसाद'

एक मुठ्ठी भूख !

मुझे  भूख   नहीं  है  , नहीं  चाहिए मुझे  रोटी  !  प्यासा नहीं हूँ मैं ! पानी भी  नहीं चाहिए ; कोई दे सके तो दे मुझे ; एक   मुठ्ठी   भूख ! और एक चुल्लू  प्यास! भूख वो जाओ आदमी को बनता है आदमी ! प्यास वो जो सिखाती है  आदमी को आदमियत ! मैं लौट जाना चाहतो हूँ ; फिर उसी बर्बरता के युग में ! जहाँ आदमी होता था नंगा ; नहीं पहनता था कपडे ! और नहीं झांकता था वो ; कपड़ों में ढके , अनढके तन को ! भूखा होता था आदमी ; पर कभी नहीं खता था  आदमी, आदमीं को ! नहीं पीता था तब कभी ; प्यासा आदमी भी  आदमी के खून को !  

गरीब आदमी क्या आदमी नहीं होते ?

एक गांव !  गांव में एक किसान ! किसान का पेट; पेट में भूख ! भूख के लिए रोटी ! रोटी के लिए काम !  काम के लिए धरती ; धरती में बने कारखाने!  कारखाने आमिरों के  आमिर बने आदमी  आदमी से एक सवाल ' सवाल : गरीब आदमी,  क्या आदमी नहीं  होते ?