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काम आया है

सुबह का भुला शाम आया है। हो करके बदनाम आया है। सियासत का रोग लगा था, करके सारे काम आया है। आस्तीन में छुरी है पर, मुँह पर अल्ला राम आया है। किस किस को लगाया चुना, बना के झंडुबाम आया है। खादी तन पर पहन के घुमा, होकर नँगा  हमाम आया है। वादे बड़े बड़े करता है, कभी किसी के काम आया है? अब के किसको चढ़ाएं सूली पहले मेरा नाम आया है। प्रसाद' रखता जेब में रोटी, क़बर में जा काम आया है। मथुरा प्रसाद वर्मा 'प्रसाद'

देशभक्ति की शायरी

कि श्रम के माथ से टपके, जो पानी हो तो ऐसे हो । वतन पर जान दे दे जो, जवानी हो तो ऐसे हो। तिरंगा ओढ़ कर लौटा है जो ये वीर सरहद से हमें भी नाज है उन पर , कहानी हो तो ऐसे हो। वहाँ पत्थर नहीं ऐसा , न उनपर नाज करता है । गिरा कर खून मिटटी पर ,चमन आबाद करता है। नमन करने वो धरती पर , चढ़ा कर शीश आते हैं माँ के उन लाडलो को ये वतन भी याद करता है। 3 बुलंदी और भी  है बात उनकी पर निराली है. सहादत कर जो माटी चूमते है भाग्यशाली हैं, चमन का हर कली हर फूल उनका कर्ज ढोयेगा, लुटाया जान अपना इस वतन पर ये ही माली है  लुटा दी जान भारत पर, मैं उनका मान जगाऊँगा। सदा गुणगान गा कर, सोया स्वाभिमान जगाऊँगा। जगाऊँगा मैं राणा और शिवा के सन्तानो को, नरायण वीर जागेगा, मैं सोनाखान जगाऊँगा। सजाकर आर्थियां जिनकी तिरंगा मान देती है। सहादत देश पर ज़ब हो तो माँ सम्मान देती है. कि उन पर नाज करती है हिमालय की शिलाएं भी, चरण को चूम कर जिसके, जवानी  जान देती है। कोई दौलत पे मरता है, कोई शोहरत पे मरता है।  वतन से प्यार जो करता है, इसी चाहत पे मरता है। रहे खुशहाल मेरा देश औ देशवासी भी, अमर मरकर वो होता है कि जो भ...

एक सच

सुन कर आश्चर्य होगा मुझे ज्यादातर कविताएं तब सूझती है जब मैं टॉयलेट सीट पर बैठा होता हूँ। और वहाँ से उठकर , कागजपर लिखकर मैं  हल्का बहुत हल्का होता हूँ।

इंसानियत कहाँ खो गया ?

उस दिन बड़ा अजीब  हादसा हुआ मेरे साथ। मैंने कुछ पर्ची में विरुद्धर्थी शब्द लिख कर बच्चो में बाट दिया। कहा - अपने अपने उलटे अर्थ वाले शब्द जिनको मिले है खोज लो। कुछ देर तक बच्च...

पलके बिछाएं हूँ अब तक !

उनके चाहत के सपने सजाएँ हूँ अब तक ! उनके यादों को सिने में बसाये हूँ अब तक !  वो मासूम चेहरा, वो झील सी गहरी आँखें ; वो उनका मुस्काना ,वो उनका शर्माना, भोली सूरत को आँखों में छुपाये हूँ अब तक ! छुप-छुप के हम फिर  हथेली से अपना सहारा छुपाना ; कुछ भी तो नहीं भुला पाए हूँ अब तक ! वो जागी जागी, रातें वो तेरी बातें ; वो जुदाई के दिन , और वो मुलाकातें ; उन्ही यादों में कहाँ  ,  सो पाए हूँ अब तक ! प्यासी-प्यासी सी मेरी भीगी  निगाहें ; ताकती रहती है तेरी वो सुनी राहें ;  तेरी राहों में पलके बिछाएं हूँ अब त क !

उजाले के फरेब

वो रौशनी ओढ़ कर,  अन्धियारे को  छलना चाहता था। वो किरण को अपने चेहरे पर, मलना चाहता था। वो पगला था ,  दिए की तरह जलना चाहता था । सच्चाई के पथ  पर अकेले, चलना चाहता था। उसने सीखा था जीवन से , सिर्फ अन्धियारे से डरना। बहुत मुश्किल होता है बिना तेल और बाती के जलना। वो नहीं जनता था  उजाले के फरेब को। उजाला टटोलती है, आदमी के जेब को। उजाले के चकाचौंध ने हर आदमी को छला है। पतंगा है तो कभी न  कभी जरूर जला है । वो गिरा है अक्चकाकर वहाँ, जहाँ उजाले का घेरा है। और तब से अब तक  उसके आँखों में सिर्फ अँधेरा है। मथुरा प्रसाद वर्मा "प्रसाद"