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डर लगता है

अब मुझ को भी डर लगता है, नइ लगना था पर लगता है। जब जब सोचा सच मैं बोलूं, सर पर आ पत्थर लगता है। बहुत हौसला मुझमें है पर, उड़ने को दो पर लगता है। जब जब भाई घर आता है, आँगन में बिस्तर लगता है। छोटे घर दरवाज़ा छोटा, पाँव उठाऊँ सर लगता है। जिस दिन माँ की याद न आए, सूना सारा घर लगता है। भाई मुझ से दूर बहुत है और मुझे फ़िकर लगता है। मेहनत करके खाना बेटा, ये दुनियाँ सुन्दर लगता है। झूठ बोल कर लूटेगा जो, मीठा उसका स्वर लगता है। दर्द छुपाकर हँस लेने में, यारों बहुत हुनर लगता है। बात ज़रा-सी होती है पर, दिल पर जैसे ज़हर लगता है। मथुरा "प्रसाद" वर्मा की बातें बोल न किसको खर लगता है।

ग़ज़ल : भँवर है लहर है किनारा नहीं है।

भँवर है लहर है किनारा नहीं है। ये मजघार है पर सहारा नहीं है। चलो आजमाएं खुदी हौसले को, हमीं हम है कोई हमारा नहीं है। जिन्हें जीतना हो, वो खुद से ही लड़ ले, किसी और से कोई हारा नहीं है। जमीन पर जो मां है, वो दोनों जहां क्या, फलक पे भी ऐसा सितारा नहीं है। जहां देखता था, वहां तुम ही तुम थे, नजर है मगर अब नजारा नहीं है। बहुत दिल किया था चलो लौट जायें, मगर कोई हमको पुकारा नहीं है। उठेगा चलेगा भले गिर गया है, अभी हौसला वो भी हारा नहीं है। जहाँ तुम नहीं हो वहाँ भी है खुशियाँ, मगर कोई तुमसा ही प्यारा नहीं है।

गजल : हम कभी आम थे अब तो आचार हैं।

२१२ २१२ २१२ २१२  अपने   हालात पे   यूँ ही  लाचार है  । हम कभी आम थे  अब  तो आचार  हैं भूख हमको लगी रोटियाँ मांग ली, तब से उनके नजर मे गुनहगार हैं  ।   जो दवा दे गया दर्दे दिल का हमें , सुन रहा इन दिनों वो भी बीमार हैं  । चोर सब मिल गये पहरेदारों से फिर , की सियासत जरा अब वो  सरकार है  । थी दुवा मांग ली चंद खुशियाँ मिले, हाथ उस दिन से दोनों ही बेकार है  ।

गजल : रूठ कर मान जाने से क्या फायदा।

212 212 212 212। ऐसे झूठे बहाने से क्या फायदा। रूठ कर मान जाने से क्या फायदा। प्यार है दिल में तो क्यों न महसूस हो, है नहीं फिर जताने से क्या फायदा। थी जरूरत तभी आप आये नहीं,  आप के रोज आने से क्या फायदा। भूखे थे तब मिला दो निवाला नहीं, मर गयी भूख खाने से क्या फायदा। आ सके ना किसी के किसी काम के, फिर अमीरी दिखाने से क्या फायदा। धर पे है नहीं छाँव माँ बाप को, इतने पैसे कमाने से क्या फायदा।...

कोई हादसा हो गया होगा ।

कोई हादसा हो गया होगा । वो चलते-चलते सो गया होगा । बदहवास गलियों में फिरता है, कोई अपना खो गया होगा । मेरे दुशमनों को फुरशत कहाँ है, कोई दोस्त ही कांटे बो गया होगा । वो आज-कल मुंह छिपाता फिरता है। रूबरू आईने से हो गया होगा । प्रसाद' मेरा कफन अब भी गिला है, कोई छुप-छुप के रो गया गया होगा !

अच्छा नहीं लगता।।

तेरे ख्यालों में इस कदर खोया रहता हूँ; कि तू भी आये तो अच्छा नहीं लगता।। मेरा ख्वाब है मुझे देख तो लेने दे; कोई जगाये तो अच्छा नहीं लगता।। अब अँधेरे कि आदत हो गई मेरे घर को; कोई दीप जलाये तो अच्छा नहीं लगता।। तू मनाता है इसलिए तो रूठ जाता हूँ; कोई और मनाये तो अच्छा नहीं लगता।। ये माना मेरे गीत है फिर भी बेवक्त कोई गाये तो अच्छा नहीं लगता।। वो हँसते है बहुत मेरे आशुओं पर प्रसाद' मुस्कुराये तो अच्छा नहीं लगता ।।

धीरे धीरे

उठने लगे है कदम धीरे धिरे। ये कहां जा रहे है हम धीरे धीरे। नफरतें बढ़ी है मगर क्यों दिलों में मुहब्बत हुई है कम धीरे धीरे।। हमने सहा है हम ही सहेंगे सनम तू करले सितम धीरे धीरे।। मेरे बिश्वास को किया तार तार, आज खा रहे है कसम धीरे धीरे।। वो जब मुस्कुराये तुम ये समझाना निकलने लगा है मेरे दम धीरे धीरे।। प्रसाद' ख्याल रखना वो  दर्द लगायेगे फिर मरहम धीरे धीरे।। यही जिन्दगी है तो मेरे मौत मुझपे करता नहीं क्यों रहम धीरे धीरे।।

तेरा नाम नहीं भूले !

हम  भूल   गए   सारी  दुनिया , वो  साम  नहीं  भूले !  खुद  को  भुला   दिया  मगर .  तेरा  नाम  नहीं  भूले  ! तेरी  जुल्फों  के  साये  में  गुजरे  वो चाँद  लम्हें ; और  होठों  से  छलकती  वो जाम   नहीं  भूले ! वो  रोतों  की   ख़ामोशी  और चुपके  से   तेरा  आना   ; वो गलियां  , वो रस्ते  , वो मुकाम  नहीं भूले ! एक  भूल  ही  सही , कभी   प्यार   किया  था  हमने  ; उस   नाकाम  मुहब्बत  का अंजाम  नहीं भूले ! वो टूट  कर दिल  का सरेआम   बिखर   जाना ; और खुद  पर  लगा  हर  इलज़ाम   नहीं  भूले., वो घुघट  की ओत  में  दुबक   कर  सिसकना ; और नज़रों  का  आंखर...

नहीं मिलता!

पैगाम  लिए  फिरता हूँ कोई दर नहीं मिलता !  भटकता  हूँ दर-दर मगर घर  नहीं मिलता! आकेले  ही  चलना  है  शायद नशीब में; इसीलिए तो   कोई हमसफ़र नहीं मिलता!  दो कदम कोई साथ चले मेरे भी, रही अगर कोई उम्र भर नहीं मिलाता !

पैगाम

पैगाम  लिए  फिरता हूँ कोई दर नहीं मिलता !  भटकता  हूँ दर-दर मगर घर  नहीं मिलता! आकेले  ही  चलना  है  शायद नशीब में; इसीलिए तो   कोई हमसफ़र नहीं मिलता!  दो कदम कोई साथ चले मेरे भी, रही अगर कोई उम्र भर नहीं मिलाता !

घटायें तो घिर आती है, बरसात नहीं होती !

बेगानों से गुजर जाते है कोई बात नहीं होती ! हम उनसे रोज मिलते है मगर मुलाकात नहीं होती । सूखे बंजर खेत जैसी जिंदगी का बेहाल है; घटायें  घिर तो आती है, मगर बरसात नहीं होती । भाग-दौड़, खीचा-तानी ओर थकान भरे ये दिन; सहर की गलियों में क्या रात नहीं होती ! वो कह गई होती है ,सब की अपनी मजबूरियां कोई तमाम उम्र किसी के साथ नहीं होती । न होता गम ,न खुसी ,न आँशु, न हंसी  जब आदमी के दिलों में जज्बात नहीं होती। प्रसाद" नाकामियों में खो न देना हौसले हमेशा गर्दिशों में हालत नहीं होती । मथुरा प्रसाद वर्मा "प्रसाद"

अम्बर को बाँटने वोलों .!

जमी बाँट कर अम्बर को  बाँटने  वोलों .! गाँव,गली,मोहल्ला, सहर को बाँटने वालों ! किस तरह होते हैं जिंदगी के चिथड़े; देख लो आकर मेरे घर को बाँटने वालों ! खुशियों के चरागों को कभी बाट कर के देखो ; अँधेरी  रातों में दर को बांटने वालों !. मत करो दूर किस्तियो को लहरों से टुकड़ो टुकड़ों में समन्दर को बांटने वालो ! नफ़रत के आग में खुद तुम ही जल जावोगे नवाजवां हाथों में खंजर को बांटने वालों ! प्यार के नाम पर क्या क्या इम्तहान दूँ  दीवाने प्रसाद क जिगर को बाँटने वालों!                 मथुरा प्रसाद वर्मा "प्रसाद"

भूल कर लेरी गलियां वो किधर जायेगा !

भूल कर लेरी  गलियां वो किधर जायेगा !  तेरी आरजू में जी रहा  था, मर जायेगा !  तू एक नज़र मुस्कुरा के  देख तो ले    बदनसीबों का मुकद्दर स्वर जायेगा ! हुस्न-ओ-जोवानी पे मत उन गुमान कर माटी का खिलौना है बिखर जायेगा !  मौत आनी आये, मगर मौत के ख्याल  आदमी क्या आदमी से दर जायेगा  काँटों से दामन बचाता रहा  था  फूलो से बचाकर नज़र जायेगा ? जद्दो जहद में गुजारी तमाम उम्र , थक गया है प्रसाद अब घर जायेगा !                            मथुरा प्रसाद वर्मा "प्रसाद"