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कोई हादसा हो गया होगा ।

कोई हादसा हो गया होगा । वो चलते-चलते सो गया होगा ।
बदहवास गलियों में फिरता है, कोई अपना खो गया होगा ।
मेरे दुशमनों को फुरशत कहाँ है, कोई दोस्त ही कांटे बो गया होगा ।
वो आज-कल मुंह छिपाता फिरता है। रूबरू आईने से हो गया होगा ।
प्रसाद' मेरा कफन अब भी गिला है, कोई छुप-छुप के रो गया गया होगा !

There must have been an accident!
He must have slept on the go!

The crap wanders in the streets,
  Someone will be lost!

My enemies do not fail,
  Some friends will have thorns!

  She keeps hiding away today,
  Rubber must have been done by the mirror!

Prasad 'My shroud is still clothed,
  There must have been a cry of hiding!


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मुक्तक

तुझको खयालो में सही कुछ तो मैंने पाया था।
ख्वाब टूटा तो ये जाना कि वो  तेरा साया था।
तू चला जा कि अब मैं लौट कर न जाऊंगा,
मैं तेरे साथ बहुत दूर चला आया था।

काम आया है

सुबह का भुला साम आया है।
हो करके बदनाम आया है।सियासत का रोग लगा था,
वो करके सारे काम आया है।बगल में छुरी छिपा रखता है,
मुह पर अल्ला, राम आया है।किस किस को लगाया चुना,
बना के झंडुबाम आया है।खादी तन पर पहन के घुमा,
होकर नँगा  हमाम आया है।वादे बड़े बड़े करता था,
कभी न किसी के काम आया है।अब के किसको चढ़ाएं सूली
सबसे पहले मेरा नाम आया है।प्रसाद' रोटी लिए जेब में रख,
क़बर में जा कर काम आया है।मथुरा प्रसाद वर्मा 'प्रसाद'

देशभक्ति की शायरी

1श्रम के माथे से टपके, जो पानी हो तो ऐसे हो ।
वतन पर जान दे दे जो, जवानी हो तो ऐसे हो।
तिरंगा ओढ़ कर लौटा है जो सरहद की निगरानी से,
कि  हमको नाज उनपर है , कहानी हो तो ऐसे हो।2कोई पत्थर नहीं ऐसा , न उनपर नाज करता है ।
गिरा कर खून मिटटी पर  जो ,चमन आबाद करता है।
नमन करने को जो जाते है कट कर शिश भूमि पर,
माँ के उन लाडलो को आज दुनियां याद करता है।3बुलंदी और भी होती है, पर उनकी बात निराली है,
सहादत कर जो माटी चूमते है वो इतने भाग्यशाली हैं,
वतन का जर्रा जर्रा शदियों तक उनका कर्ज ढोएगा
कि अपनी जान दे कर भी करते सीमाओं की रखवाली है।
4रुधिर जो लाल बहती नाड़ियो में, मैं उनका मान जगाऊँगा।
विप्लवी गान गा गा कर सोया स्वाभिमान जगाऊँगा।
जगाऊँगा मैं राणा और शिवा के सन्तानो को,
नारायण वीर जागेगा, मैं सोनाखान जगाऊँगा।5सजकर अर्थियो में जिनको तिरंगा मान देती है।
सहादत को उन वीरों के , माँ भारती सम्मान देती है।
कि उन पर नाज करती है हिमालय की शिलाएं भी,
चरण को चूम कर जिसके,  जवानी  जान देती है।6हजारो शत्रु आये पर , पर हमको कौन जीता है।
कभी हिम्मत के दौलत से न हमारा हाथ रीता है।
वंशज है भारत के हम ,धरम पर मर…

एक सच

सुनकरआश्चर्य होगा
मुझे ज्यादातर कविताएं
तब सूझती है
जब मैं
टॉयलेटसीटपर बैठा होता हूँ।
और वहाँ से उठकर,
कागजपर लिखकर
मैं  हल्का बहुत हल्का होता हूँ।

इंसानियत कहाँ खो गया ?

उस दिन बड़ा अजीब  हादसा हुआ मेरे साथ।
मैंने कुछ पर्ची में विरुद्धर्थी शब्द लिख कर बच्चो में बाट दिया। कहा - अपने अपने उलटे अर्थ वाले शब्द जिनको मिले है खोज लो।
कुछ देर तक बच्चे सोर कर के पूरे कक्षा में अपने साथी खोजते रहे।सच कह रहा हूँसारे शब्द मिले उनके विरुद्धर्थी शब्द मिल गएएक बच्चा वो पर्ची लेकर अकेले खड़ा था जिसपर मैंने बड़े बड़े अक्षरों में हैवानियत लिखा था।


इंसानियत कहाँ खो गया आज तक नहीं मिला।
मथुरा प्रसाद वर्मा

लाचार हो गया हूँ।

अपनेहालतपेयूँ लाचारहोगएहैं. आमथेकभी, आचारहोगएहैं.
अपनी आजादीपेकिसकीनज़रलगीप्यारे उम्रभरकेलिएगिरफतारहोगएहैं . 
भूखलगीतोहमनेरोटीक्यामांगली, उनकीनिगाहोंमेंगुनाहगारहोगएहैं